बात पुरानी है, सच में कही, अब कहानी है, जिस को नज़र आ गयी, उसकी जानी है, मानी है, दूसरों को 'maybe'! बेमानी है! तो आखिर सच है क्या? अनिभिज्ञ, अंजान, अजनबी? अनदेखी, कैसे मानें, फ़िर भी, सब यकीन खुदा हैं? कही-सुनी, बात पुरानी, कहने को सब की जानी, या सिर्फ़ मानी, बेमानी! सच्चाइयां नहीं समाती दुनिया के दिए पैमानों में, जो कह रहे हैं दिलोदिमाग, और ज़ज्बात उनके शब्द नहीं बने, तो जो है वही कहना होगा, सच हज़म नहीं होता, वो किस्सा कहना होगा!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।