सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मौसम लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन के मौसम!

  मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, बादल ले कर आसमां आ रहे हैं, रंगों को कुदरत से छलका रहे हैं, ब्रशस्ट्रोक हवाओं के लहरा रहे हैं, कैनवास पल–पल बदल आ रहे हैं, ज़मीन पैरों तले पिघला रहे हैं, खड़े हैं जहां, वहीं बहे जा रहे हैं, मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम जहां जा रहे हैं! पहुंचे थे पहले पर अभी आ रहे हैं मूर्ख हैं जो वक्त से नापने जा रहे हैं, खर्च वही है सब जो कमा रहे हैं, दुनिया कहेगी के गंवा रहे हैं, और जागे हैं जब से जो मुस्करा रहे हैं!

रास्ते कहिन!

  रास्ते हैं, जिंदगी से यही अपने वास्ते हैं, कहां पहुंचेंगे, ये सवाल बेमानी है, मोड़ आयेंगे,  मुड़ जाइए, कभी भटक जाएंगे कभी खो जायेंगे, ढूंढने आपको रास्ते ही आयेंगे रास्ते आपको कम नहीं करते, न ही साथ छोड़ते, कभी लड़खड़ाए, कभी छिल गए घुटने रास्ते बस कह रहे रुकने, संभलने, जरूरत समझ बदलने! भागते क्यों हैं? करिए अपने कदमों का यकीं!

हिम्मत के हथियार!

हिम्मत के हथियार चाहिए नफरत नहीं प्यार चाहिए अपने हाथों में हो अपनी कश्ती की पतवार , हिम्मत के हथिया र, हिम्मत के हथियार.... कौन कहे किस को बेगाना , मजहब किसने समझा जाना मंदिर मस्जिद की बातों में, नफरत से इंकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... कब तक हम बर्दाश्त करेंगे, मासूमों पर वार सहेंगे दिल में अपने प्यार जगा दे, अब ऐसी ललकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... अपने सबको ही प्यारे हैं , बीच में कौन से दीवारें हैं गुलशन हरसू फूल खिला दें, ऐसे कारोबार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको सबका साथ चाहिए, हर झगडे की मात चाहिए नेक इरादों के मौसम से, ये दुनिया आबाद हिम्मत के हथियार , हिम्मत के हथियार.... सबके दिल में आस चाहिए , उमींदों की प्यास चाहिये मौसम बदलेंगे जब बदलें, मौसम के आसार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हक की सारी बात चाहिए नहीं कोई खैरात चाहिए, चलिए बनें संविधान के ऐसे पहरेदार, हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको खबर ए यार चाहिए दोस्ती भाईचार चाहिए रि...

सर्दी और सुबह!

फिर आ गयी सिरहाने से, एक सुबह जाग उठी है! आज सुबह बस आई सी है, कुछ ज्यादा अलसाई सी है! छुट्टी मांगी नहीं मिली, सूरज की भी नहीं चली! गुस्से से लाल पीला है, जागा अभी अकेला है! पुरे दिन पर सुबह छलकी पड़ी है, धुप तेज पर सर्दी को हल्की पड़ी है! सर्द रातों को सबक सिखाने, बद्तमीज सुबह जरुरी है?  सर्दी में सुरज की बदतमीजी बड़ी हसीन है, बेशर्म हो कर ज़रा धुप को छू लेने दीजे!! सुबह शाम है और दिन रात भी, सब कुदरत है और करामात भी!

बादल बारिश मौसम

दिखती नहीं है बारिश पर छू जाती है, चलो वहां रुकें .. सही में कहीं दूर से,  जैसे अनजाने सुरूर से, आया कितने गुरुर से, बादल वहीं पे, सबको  सरोबर करके  हसीं कारोबार करके उदास होते, लम्हों को प्यार करके बारिश  है कहीं, हाथ में डोर लिए,  अपना सच छाप के, अपना रास्ता नापते, मौसम झट से , कल को छोड़ के,  होकर नये मोड़ पे, सब के सच बदलती जमीँ 

खुदगर्ज़ मन की दुआ!

गर्मी में बारिश की झलक,  नेक इरादॊं के फलक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक,  कुछ देर तलक और चंद  लम्हों तलक, झपक न जाये पलक बिरली सच्चाई है देर उतरेगी हलक  खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक   सुन के बादल कि गरज, जाग उठती है ललक  कौन जाने असर दुआ का है,  या मर्ज़ी ए मलक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक  हम अकेले नहीं, कहती है पंछी की चहक सर हलाती हैं जमीं,  भेज मट्टी कि महक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक  कान में बारिश की टिपक, पत्तों पे बुंदों की चमक, हर सांस इशारे से, कहती है ज़रा और बहक खुदगर्ज़ मन की दुआ,  कुछ देर तलक, कुछ देर तलक 

हमारी क्या प्रकृति है?

क्या निसर्ग से हमारा कोई रिश्ता है? पंछी के कलरव से नदिओं की कल-कल से पत्तों की सर-सर से दिल मे कोई हलचल है! नदियां तो सब पाक साफ़ हैं हैं अब भी? पवित्र ! पर साफ़ कहाँ... .? चाहे गंगा कह लो या थेम्स नील, राएं, मिसी सिपी या वोल्गा इन सब से हमारा क्या सम्बन्ध है? पेड़ों के बढने से चिड़ियों के उड़ने से ....  उन सब से जो जीवित भी(तो) हैं जीवंत भी क्या वो सब हमारा हिस्सा नहीं ? या यूँ पूछिए क्या हम उस सब का हिस्सा नहीं ? तो क्या हम निसर्ग नहीं ?..... ( जिददु कृष्णमूर्ति के शब्दों से अनुरचित )