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जमीनी बातें!

जब जमीं मकां होती है तो जश्न होता है मकान के जमीं होने पर क्यों अश्क होता है मेरे पैर ज़मीन हैं, कितने नुक्ताचीन हैं, खाते हैं दर ठोकरें फ़िर भी यकीन है! खासे आसमान हैं, रंगों में कितनी जान है! उड़ रहे हैं वो जिनको हांसिल आसान है! जमीं को भी भरोसा है, पैर भी यकीन हैं, आज़ाद है अधूरे दोनो, और पूरे अधीन हैं! मीठे हैं कहीं पर हम और कहीं नमकीन हैं, ज़मीन से हैं सच या सच से यूँ ज़मीन है? उड़ गए वो जिनको परों को कम यकीन है! कैसे समझें पैरों को ज़ंजीर नहीं जमीन है! ज़मीन जड़ है, दीवार नहीं ओ आसमाँ छत, फिर भी अटके हैं सब नाप मीटर,फीट,गज!!

छंद समंदर

साहिल किनारे, समंदर के धारे, सुबह के नज़ारे, रोशन ज़हाँ रे! उम्मीदों के इरादों को कैसे इशारे, यकीनों को सारे नज़ारे सहारे! लहरों के रेतों पर बहते विचारे, लकीरी फकीरों के छूटे सहारे! हर लहर को मिले अलग किनारे, दूजे को देख क्यों हम आप बेचारे ? दूर यूँ उफ़क से समन्दर मिलारे, सपनों को अपने कुछ ऐसे पुकारें! किनारों को समेटे समंदर ज़हाँ रे, किनारों को लगे वो उनके सहारे 

सफ़र के नुस्खे!

मुसाफ़िर रास्ते चुनते हैं मील के पत्थर नहीं गिनते, चलते रहिये युँ ही सफ़र अपने माफ़िक-ए-मन के! फ़िर पहलू से एक करवट उठी है, फ़िर कोई आहट एक लम्हा बनी है, फ़िर कोई नज़दीकी फ़ांसला बनी है  फ़िर एक आह सफ़र हो चली है!  कुछ नहीं बदला है तो क्या अलग है, देखें आज़ शफ़क को क्या फ़लक है? देखें आज़ उफ़क को क्या ललक है? नये लम्हों को ज़ज्ब करने मेरी पलक है! सफ़र लंबा है, दो साँसें आज ली तो लीं, पीछे क्या मुड़ना दो घड़ियां जरा जी तो लीं उठा लो अगला कदम दौर बदलने दो, फ़िर दास्तां बनेगी, आपको फ़ूर्सत मिली न मिली ! दिन के गुम दो-चार पहर, भटके हैं क्युँ शहर शहर डर, विपदा, अंजान कहर, ठोर कहां और कहां ठहर कुछ देर रुके हैं, तो हम मुसाफ़िर कम नहीं होते, ज़ारी सफ़र सदिओं से साहिल के किनारे, खड़े हैं (शफ़क - skyline during sunset; उफ़क़ - horizon; फ़लक - universe, sky)

सफ़र, नज़र, असर, सहर, कहर

एक और सफर नज़र में है, एक और कदम असर में है, निकल पड़े हैं फिर रास्तों पे, एक और सुबह सहर पे है पलटते रास्ते, थके हुए सवाल, ऊंघती उमीदें, दम तोड़ते जज़्बात, बड़ते कदम, ललचाते प्रश्नचिन्ह, नज़र आसमान, ये एहसास असीमित संभावनाओं से कोई अवकाश नहीं, फिर भी कोई प्यास नहीं साहिल होने कि तमाम मुश्किलें हैं, क्या मुमकिन कोई आस नहीं? क्या नया क्या पुराना है करवट लिये दिन रात बैठे हैं लम्हे तैश में ऐठें हैं अपनों से दूर हो कर अपने ही पास बैठे हैं आपकी नजर है, आपकी परख है, आपकी कवायत है, आपका फरक है! किसकी गरज़ है, किसको कसक है, तज़ुर्बा किसका है, किसका सबक है! इंतज़ार पर यकीं  कोने में छुप कर बैठी हैं शामे हंसीं, नज़र के भागने से दिन नहीं बदलते सच बड़े महीन होते हैं, नाज़ुक सारे यकीं होते हैं, मेरे होने ना होने से क्या गर आपके पैर जमीन होते हैं! आईना चेहरा नहीं दिखाता, सच्चाई दिखाता है, दौर ही ऐसा है , सच पर किसको यकीं आये? ख्याल सबके पैर पसारे हैं, आप क्यों बैठे किनारे हैं तजुर्बे आपके भी अल्फाज़ मांगते हैं कौन कहता है आप बेचारे हैं !