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आसान मुश्किल!

ये जो मेरे जमीन आसमान हैं, ये ही मेरे सपनों के सामान हैं! मुझे कहां पंख लगते हैं, उड़ने? वहीं हूं जहां मेरे अरमान हैं! वो ढूंढे जमीं जो आसमान हैं! पैर कहते हैं पुरानी पहचान है!! फिक्र कहां, कब कहां पहुंचेंगे? चल दिए, वही अपना अंजाम है! खोए हैं, अपनी ही तलाश में, कौन कहता है काम आसान है? बनावट, दिखावट, सजावट सब, महंगा सामान ओ सस्ती दुकान है! अक्स है वो, सब जो तराशते हैं! कब समझेंगे बदलता मकान है!

धीरे धीरे ... और खत्म?

 आप धीरे धीरे खत्म होते जाते हैं, अगर आप सफ़र को नहीं जाते हैं, अगर आप कुछ बांचते नहीं, ज़िंदगी को उसकी आवाजों से भांजते नहीं, आईनों में अपनी तस्वीर को मांजते नहीं  आप धीरे धीरे अंत हो जाते हैं, जब आप अपनी मान्यता मारते हैं अपनी तरफ़ बड़े हाथों को नकारते हैं, आप धीरे धीरे खत्म हो जाते हैं, अगर आप आदतों से अपने को बांधते हैं, रोज वही लकीर पीटते हैं - रोज के सधे हुए दिन को साधते हैं, अगर आप नये रंगो को नहीं पहनते, किसी नये को नहीं चीनते, आप धीरे धीरे काफ़ूर हुए जाते हैं, अगर आप दीवानेपन से कतराते हैं, और उसकी रवानगी से, जो आपकी आँखों को नम करती है, दिल की धड़कनों को चरम करती है,  आप धीरे धीरे नासूर हुए जाते हैं अगर आप अपनी ज़िंदगी नहीं बदलते उस वक्त ज़ब आपको, आपका काम नहीं चलता, रिश्ते में दिल नहीं पलता और आपको अपना माहौल नहीं फ़लता अगर आप अपनी यकीनी को जोखिम नही सिखाते, उसके लिये जिसका कोई ठिकाना नहीं, अगर आप किसी सपने का साथ नहीं देते, अगर आप ज़िंदगी में कम से कम एक बार, अपने को ये इज़ाज़त नहीं देते, कि भाग खड़ॆ हो नेक नसीहतों से - पा...

उस्ताद शबाना!

ये शबाना है , हिम्मत , लगन को दुनिया में रहने का बहाना है , मुश्किल है फ़िर भी मुस्कराना है , कल की बात बेमानी है , आज़ को आज़ ही सुलझाना है , और तरीके अपने , (मक्का मस्ज़िद, हैदराबाद में शबाना अन्य महिलाओं को ऐरोबिक्स करा रही हैं)‌ ( दुसरी क्लास में शबाना स्कूल छोड़ दी क्योंकि उऩ्हें टीचर से इज़्ज़त नहीं मिली ) दुनिया तो हर तरीका आज़मायेगी , (बुरके की परिभाषाओं को बदलते हुए शबाना) कभी फ़ुसलायेगी , कभी ताकत आज़मायेगी , कभी नाउम्मीदी के सपने दिखायेगी , पर ये दाल यहां नहीं गलेगी , कुछ करना है , नया ही सही , ड़रने कि लिये पूरी जिंदगी पड़ी है , (13-14 साल की उम्र में शबाना अपने को 16 मानकर / जानकर प्ले फ़ॉर पीस ( www.playforpeace.org ) कि सदस्य बनीं और पुराने हैदराबाद की संकरी गलियों में बच्चों को मुस्कराने , हँसाने लगी !) गुड़मॉर्निंग , फ़ोलो मी जैसे कुछ लफ़्ज़ बोल इंग्लिश मीड़ियम स्कुल में भी जानी जाने लगी , ड़र तो था , पर अपने से मुहब्बत कैसे छोड़ दें , हर एक मकाम पर आकर भी , “ बस अब एक और सपना है " सोच ने रोक...