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फ़रेब दिल के!

आईने झूठे हैं या हम मुस्कराते हैं , दिल को कैसे कैसे फ़रेब आते हैं , युँ ही याद कर लेते हैं आपको , यूँ ही आपके करीब आते हैं , मुश्किल नहीं होती आपके जाने की , हम नहीं रोज़ नसीब आज़माते हैं , खामोश आहटें साथ चलती हैं , नहीं दुरियों का शोक मनाते हैं आपकी मोहब्बत के गरीब नहीं ,  फ़कीरी के वो अंदाज़ आते हैं ! न हों तो हर लम्हा बदल जाता है कहां हमको ज़ुदा हिसाब आते हैं ऐसे कोई अकेले कम नहीं पड़ते , पास आये तो दुरियाँ गिनाते हैं बिस्तर को अकेले कम नहीं पड़ते दो हों तो क्यों फ़ासंले गिनाते हैं ? दिल को कैसे कैसे फ़रेब आते है , सपनों में भी हमको आज़माते है

कुछ हुआ होगा

हमारे न होने को वो आराम कहते हैं, खामोश हुं तो उसको शाम कहते हैं अपनी परेशानियों को मेरा नाम कहते हैं जिक्र आये तो बस ' ह राम ' कहते हैं हमसे बरबाद होते हैं औरों से आबाद इल्म न था यूँ होंगे यार मेरे हालात किस्मत से यार मेरे रकीब बनते हैं क्या मुश्किल है जो मेरे करीब बनते हैं कहने को तो दोनो खासे शरीफ़ बनते हैं हाथ फ़ैलानें से कहां कोई फ़कीर बनते हैं नज़दीकियों से उनकी मेंरे नसीब बनते हैं दुरियों से उनकी हम गरीब बनते हैं अपने ही इरादों के हम कहां काबिल 'कहने को' दुनिया है, पर 'कहां गालिब' तन्हाइयों के मौसम हैं तन्हाइयों के सवाल मेरा हाल पुछते है , मेरे हालात दिल मे जो है वो ही बयान करते हैं हम कहां लम्हों को सामान करते हैं जो ज़जबात है वही अरमान करते हैं  जिंदगी जो उसी को जान करते हैं हम फ़रमाते हैं उनको लगता है भरमाते हैं हासिल ऐसे लम्हे भी जब वो शर्माते हैं मनमाफ़िक हालात न हो तो गरमाते हैं मेरा मज़हब है जब मेरे करीब आते हैं