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आज़–कल

आज़ की सोच फिर कल की बात करते हैं, गुजरते सच को भला क्यों हालात करते हैं? हदें सारी सिमट गई हैं आज तंग यकीनी में, हमराय न हुए तो कातिल जज़्बात करते हैं! मोहब्बत यूं भी गरीब है तमाम सरहदों से और फिर ये बाजार जो हालात करते हैं! यूं नहीं के इंसानियत बचीं नहीं है कहीं, पर बस अपने ही अपनों से मुलाकात करते हैं! तालीम सारी मुस्तैद है सच सिखाने को, वो शागिर्द कहां जो अब सवालात करते हैं! कातिल हैं मेरे वो जो अब मुंसिफ बने हैं, और कहते हैं क्यों खुद अपनी वकालात करते हैं! फांसले बढ़ रहे हैं दो सिरों के मुसलसल, ताकत वाले बात भी अब बलात् करते हैं! हमदिली की बात अब डिज़ाइन थिंकिंग है, बेचने को बात है, सो ताल्लुकात करते हैं! दीवारें चुनवा दीं हैं रास्तों में किसानों के, सुनने की इल्तजा पर घूंसा–लात करते हैं! [तालीम - education; शागिर्द - student; मुसलसल -continuous; हमदिली- Empathy ;  बलात्  - by force ; इल्तजा - request] 

बहुत दूर की बात!

इंसानियत का दूरियों से गहरा नाता है, मणिपुर दूर है, गाज़ा नजर नहीं आता!    औरत की इज्ज़त बहुत जरूरी होती है, पर जंग की अपनी मजबूरी होती है!! बच्चे वैसे तो सारे ही भगवान हैं, पर गाज़ा में तो सब "मुस्लमान" हैं? आसमान से खाना, खाने पर बमबारी, नफ़रत हद पार तो बन गई बीमारी! मणिपुर और गाज़ा दोनो ही ख़बर नहीं हैं, कब्र हैं तमाम किसको फिकर नहीं है! सच नंगा है ऊपर से मर्दानगी का धंधा है, इज्ज़त लूट रही है और बाकी हाल चंगा है! शराफत का इस दौर में न करो तकाज़ा आप के कोई नहीं जो निकला जनाजा! खबरें वो होती हैं जो सच बताएं, सच वो है जो सरकार बताएं! सरकार शातिर है, झूठ बोलती है, क्या है आज की ताजा खबर ? बताएं ?

गूंजती खामोशियाँ!

सब खामोश हैं कोई सुन नहीं सकता? दर्द सारे मज़हबी रंगों में बिकने लगे हैं! बेख़बर अपने खंजरों से, इतने मासूम हैं सारे दोष शिकार के, ऐसे गुनहगार हैं!  किस किस क़त्ल पर भगवान का नाम है, बस एक मत्था टेका के सौ खून माफ हैं! इतनी चुप्पी है या कान के पर्दे फट गए? इतने घिनौने सच, सब धर्म जात में बंट गए! नफ़रत माफ, झूठ माफ, सरेआम कत्ल माफ़? अपने धर्म की शिक्षा सबको कितनी साफ है! घर बैठे हर एक गुनाह की वकालत करते हैं, आंखों पर पट्टी बांध सब इबादत करते हैं! अपनी कमियों ने कितना कमजोर किया है,  इलाज़ ये कि किस किस को दोष दिया है? यूँ नहीं की शहर के सारे आईने ख़ामोश हैं!  किसके हाथों बिक रहे हैं, ये किसको होश है? ज़ुल्मतों की कमी नहीं, और रोशनी कातिल है, किसको इल्ज़ाम दे के अपने ही सब शामिल हैं! (ज़ुल्मतें - अँधेरे)

पेड़-पौधे अदने-बौने!

वो एक खूबसूरत सुबह,  सूरज की रोशनी से चमकती  और उसी की प्रछाई से पुरस्कृत  पास ही में वो बगीचा,  रंगों से सराबोर सारे रंग ज़िंदगी के और सब उतने ही उद्धंड और  घांस इतनी घनघोर हरित  कि आँख और दिल  दोनों भर आयें,  और उनके पार पहाड  आशा की ओस में नहाए, एकदम तैयार ताजगी से चमकते हुए चलने को तैयार कितनी मनमोहक सुबह हर चीज़ सुंदरता से सृजित संकरे पुल के उपर बहती धारा के बीच जंगल के गलियारे में पत्ते किरणों से  चंचलित! चंचलता जो उनकी परछाई को रोशनी दे रही थी वो सब साधारण पेड़-पौधे थे, पर अपनी हरियाली और ताज़गी से उन्होंने  उन सब पेड़ों को  पीछे छोड़ दिया था, जो नीले आकाश को  चुनौती देने में व्यस्त थे! (जिद्दू कृष्णमूर्ति की सुबह की चहलकदमी की अभिव्यक्तियों में से एक का काव्यानुवाद)

भागते रहो!!

चारों तरफ पहरा है, बंदोबस्त, जबरजस्त एक पूरे मुल्क की ताकत, कर रही है हिफाज़त? चौबीसों चौकन्ने, तीसों होशियार, क्या मज़ाल किसी की, ख़बरदार! सुई पटक सन्नाटा, बेहिसाब असला, कहाँ कोई मसला? इसे कहते है ताकत, लोकशाही की, चप्पा चप्पा मुस्तैद, सबका साथ, सबका हिसाब! कश्मीर! एक जेल! कश्मीरियों के लिए! वाह! भारत सरकार! वाह! जहां चाह, वहां आह! मासूमियत बेपनाह!

सुबह समझिए!!

सुबह झांकती है हर कोने से, देखिए!  ज़रा उचक अपने बिछौने से, साथ चलने को तैयार, रोशन,  होशयार! अकेले कोई भी नहीं है, अगर आप सिर्फ़ "मैं" नहीं हैं, केवल एक इंसान? इतनी सिमटी पहचान? ढूंढते फिरिए फिर, भीड़ अपनी पहचान, कपड़ों की डिज़ाइन, चेहरे का नक्शा, फेयर व लवली, नॉट सो ईजिली!! जमीन आसमान, जंगल जीव खुला दिल तहज़ीब, फूल पत्ते, मधुमक्खी के छत्ते, गुम होते जानवर, काली होती हवा ? पूछिए खुद से! आप कौन हैं? उस दौड़ की भीड़! जिसकी खो गई रीढ़? या उस दुनिया के अजूबे, जिसमें लाख जीव जंतु दूजे? अकेले अपने लिए, अपने मैं, अपने कुनबे, अपने जात, या ये जगत आप की जात, सब सबके लिए? आप प्राणी हैं या महज़ एक इंसान? अकेले हैं? या सुबह के साथ?

करज़दार

यूँ भी किसी के शुक्रगुज़ार न रहो,  न कर्ज़ बनो ओ' न उधार ही रहो! हमसफ़र हैं सभी इस दुनिया में,  कभी कि सी के गुनहगार न रहो मेरी मर्ज़ी थी सो मैंने कर दिया, मर्ज़ी तुम्हारी तलबगार रहो न रहो! अपने ही यकीन के साथ जीते हैं, बेचते हैं क्या, के खरीददार न रहो? ये एहसानों का धंधा बड़ा पुराना है,  खुदगर्ज़ी से तुम मददगार न रहो! किसी की ख़ातिर कुर्बानी फ़िज़ूल है, दिल-ओ-ईमान के दुकानदार न रहो! आसानी से आपको उस्ताद बना दे,  बाज़ारी तालीम के खरीददार न रहो! हर एक शख्श अपने तय रास्ते पर है, औरत है सिर्फ़ यूँ सिपहसालार न रहो! सही-गलत ही सिर्फ़ दो सच बचे हैं, ज़िंदगी के इतने तंग समझदार न रहो! मुक्तलिफ़ ज़मीन है सबके तज़ुर्बों की फ़क्त अपनी सोच के ज़मींदार न रहो!

मजबूर नफ़रत

अपनी जंग के सब मजबूर हैं, सच्चाई के कौन जी-हुज़ूर हैं? गुस्से में इतने के खुद से दूर हैं, कैसी मुल्कीयत के पाकिस्तान ज़रूर है? आवाज़ अलग है तो उसको जला देंगे, कौन इंसान जिसको खून जरूर है? नफ़रत के कितने सब मंज़ूर हैं, क्या कीजे के आदमखोर हुज़ूर हैं! सच छुप जाए यूँ के हम मग़रूर हैं, डरी हुई आवाम को छप्पन जरूर है! इंसान ही इंसान को काफ़ी पड़ेगा, कौन कहता है क़यामत जरूर है? लाज़िम है के खामोशी एक राय है, कुछ तो इशारा हो के नामंजूर है? दूध का रंग सुर्ख नज़र आता है, क्यों रगों में आज इतना सुरूर है? मूरख गिन रहे हैं अपने और उनके, आख़िरकार इंसान को इंसान जरूर है!

शैतानी इंसानियत!!

एक दूसरे की जान लेते हैं, चलिए इंसान पहचान लेते हैं! अपनी ही वहशियत का शिकार है, तशदुद इसका अज़ीज हथियार है! इंसानियत कोई बड़ी कीमती चीज है, शायद इसलिए किसी तिज़ोरी बंद है! कुछ भी नामुमकिन नहीं इंसान को, तबाह कर देना अपने ही नाम को!  अपने गुनाह इतिहास में शान हैं, कोई और करे तो वो हैवान है! हर दौर में इंसानियत की फसल फलती है, उसे हज़म करके हैवानियत पलती है! सियासत कब्रों की खेती है, ज़मुहरियत में भी होती है! मानव ही मानव का शिकारी है, इंसानियत चीज़ बड़ी बेचारी है! ताकत के ज़ोर पर, बेहिसाब लोगों को मार डाला, मनुष्य ने प्राणी कहलाने का, अपना हक़ मार डाला!

लाहौर की ओर

सरहदों का काम रास्ते दिखाना है, रास्ते फ़क्त कमबख्त इन्सां आते हैं! जो सरहदें रोकती हैं वो इंसा को कम करती हैं, चलिए उस और भी कुछ नेक इरादे कर लें! मुसाफिर जब चलते हैं, रास्तों के दिल पिघलते हैं!  यूँ उम्र से कहाँ कोई जवान होता है वो जो आपके पैरों का निशाँ होता है! सरहद सीमा हो जाए तो मुश्किल होगी, हद हो गयी इंसाँ होने की तो क्या इंसाँ?? अपने इरादों से चलिए रुकिये, लकीरों के राम क्यों बनिये?    रास्ते चलते हैं और हम मुसाफिर, सर जो छत उसकी कोई जात नहीं ! आज इस ओर हैं कल उस ओर, जोर के इरादे, क्या इरादों का ज़ोर उम्र भर सफ़र है दो कदम और सही, यूँ भी इंसाँ हुआ करते हैं!  सरहदें ज़हन की दीवारें बनती हैं, वरना दो इंसाँ मुस्करा के बस मिलें! (लाहौर के सफ़र की तैयारी करते हुए साहिल पर मिले चंद ज़जबात)

मर्द -औरत

कुछ लोग दुनिया के औरत होते हैं ज्यादातर तो सिर्फ बेगैरत होते हैं! देवीओं के भजन और देवीओं का ही भोजन, न सज्जन है कोई ढंग का, न ढंग का साजन! कितने बेअसर अब सारे मर्द होते हैं, दवा हो नहीं सकते फ़क्त दर्द होते हैं! छाप मर्द की है और निशान औरत के, बड़े फुजुल है कायदे तमाम शोहरत के दबंग होना मर्दानगी और छिछोरापन तहज़ीब है, क्या समझें अपनी कुछ रवायतें फ़िर अज़ीब हैं! कौन कहता है मर्द को दर्द नहीं होते, बात अंदर की है, मामले युँ सर्द नहीं‌ होते, युँ कि, जब हम इज़हार करते हैं, क्या मज़ाल किसी की, हम इंकार नहीं सुनते! स्त्री धन है, बहुत मर्दॊं के लिये, बदन है, फिर भी क्यों मां बनती है, बढ़ा प्रश्न है?