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मर्द नज़र!

एक बदन हैं बस, दो स्तन हैं बस, रास्ते पड़े हैं बस आपके भरोसे हैं बस! ज़रा आंख फेर लो ज़रा हाथ फेर लो ज़रा अकेले में घेर लो, ज़रा नोच-खसोट लो! कुछ ज्यादा ही नखरे हैं, कुछ ज्यादा ही मुकरे है, कुछ ज्यादा ही हंसती है, आख़िर क्या इनकी हस्ती है? "न" कहा तो हाँ है, कुछ न कहा तो हाँ है, जो भी कहा वो हाँ है, "न"का हक कहाँ है? बेवज़ह हंसी होगी इसलिए, कपड़े कम है इसलिए, अकेले निकली है इसलिए, ये शोर इतना किसलिए? बहुत पर निकल आए हैं, बहुत कमर मटकाए है, बहुत आगे ये जाए है, कोई तो सबक सिखाए है!! कुछ तो किया होगा? बिन चिंगारी धुआँ होगा? मर्द से कंट्रोल न हुआ होगा? इज़्जत गई अब क्या होगा? घर बिठा के रखिए, अंगूठे नीचे दबा रखिए, पहले अपनी जगह रखिए, चाहे कोई वज़ह रखिए ! ये मर्द नज़र है, यही नज़रिया भी, ज़ोर लगाना है ताकत का, बस यही एक ज़रिया भी (एक नज़दीकी के साथ ट्रेन में जब वो सो रहीं थी एक मर्द ने छेड़खानी की, गलत तरीके से छुआ, अपने शरीर के अंगों को प्रदर्शन किया! ये कोई खास बात नहीं है, आम बात है।पर उसके बाद क्या हुआ अक्सर नहीं होता।...

अरे!बाबा और 40 रेप!

एक समय की बात है, एक देश में रेप रहता था, कभी कभी, दबे पाँव, चुपके से, अंधेरे में, मौका ताड़ कर वो हो जाया करता था, उसको लोगों ने अलग अलग नाम दिए, कभी चीर हरण कहा, कभी गुरु का प्रसाद कभी बनवास, सब को लगा,  चलो कभी कभी हो जाता है, जाने दो! रेप ने भी बड़ी मेहनत की, उसने इज़्ज़त के धंदे में पैसे लगा दिए, बस फिर क्या था, बाज़ार गर्म होने लगा, लड़ाइयों में लोग रेप को मिसाइल बना लिए, रेप को फ़िर समझ आया, ताक़त के खेल में उसका भविष्य है, और वो जान गया कि मर्द सामाजिक विज्ञान का फेल है! बस उसने मर्दानगी के साथ MOU साइन कर लिया जब कभी किसी को कम पड़े, बस रेप से वो और मजबूत मर्द बने! बस फिर क्या था, घर घर में, गाँव शहर में, धर्म जात, अमीर गरीब, हर जगह रेप का बोलबाला हुआ, मरदानगी का ये ख़ास निवाला हुआ। बस में, हस्पताल में, चॉल में मॉल में, जेल में जंगल में, बालिका मंगल में.... रेप सर्वशक्तिमान, सर्वदर्शी, सर्वज्ञानी, सर्वभूत है, यानी रेप हमारे नए भगवान हैं इनके सामने बच्ची-माता सब 'सामान' हैं, क्षमा कीजिए!! 'समान' हैं चलिए रेप...