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कौन पहचान!

एक छत चार दीवार घर  गली शहर सुबह शाम चार पहर वास्ते किसके, किससे, साथ, रिश्ते दोस्ती आसमान, जमीन, पेड़ पौधे रंग हजार, ऊंची उड़ान, गले मिलती हवा  धूप सहलाती वास्ते किसके किससे! साथ रिश्ते दोस्ती ये धरा आपकी क्या है आपकी पहचान?

हम आप आज कल!

वो ज़हर जो हमको क़ातिल करता है, रामबाण है, अचूक असर करता है! कौन है जो दिल ये नफ़रत भरता है? आप ही आइए जहां हम मिलते हैं ! अलग चाल है सबकी और चलते हैं!! रिश्ते क्यों हम को अलग करते हैं? जो भी ख़बर मिली वो ही सच है? बुरी है बात और किसी के सर है! डर और नफ़रत आपके घर है! किन रंगों से आईने रंगवाए हैं? क्यों नफ़रत नज़र नहीं आए है? सड़क पर मार दिया ये न्याय है? रामराज्य, राम नाम, आसाराम, बाबाराम, घोर कलयुग है और ये सब राम के काम? सोच, तर्क, विज्ञान का तो काम तमाम! धर्म का धंधा, खरीददारी चंदा, राम नाम में बढ़े फायदे में बंदा, घटिया नीयत और काम गंदा!

रिश्ते!

रिश्ते सारे नाप बन गए,  कैसे ये हम आप बन गए? कहने को सब साथ बन गए, गए तो खाली हाथ बन गए? लेनदेन से जाँच रहे सब, कैसे ताल्लुकात बन गए? अपनी ज़िद्द के पक्के सब, कितने इल्ज़ामात बन गए? हाथ खड़े कर दिए हमने, यूँ नामुमकिन बात बन गए! ख़ामोशी आवाज़ बन गई, और सब चुपचाप सुन गए! कैसे ये हालात बन गए? आप मेरे जज़्बात बन गए? न मानी बात बेमानी हुई, मानी क्यों इसबात बन गए? (मानी - accepted ; मानी - meaning; इसबात - certain, proof) नज़दीकी में जात बन गए, खून की घटिया बात बन गए

पहचान से - अधूरे

कोई भी एक पहचान, हमें अधूरा करती है, हवा, पानी, राख, मिट्टी, लाखों ख़्वाब, रंग जाने पहचाने, रिश्ते, माने न माने वो सब जो कभी हाथ थामे, कभी एहसास बन, कभी प्यास बन, हमारे रास्तों के हमसफ़र हैं, बिन उनके, हम कम हैं, हम एक हैं नहीं, पूरे अधूरे हैं, अधूरे पूरे हैं!

ये कैसे रिश्ते?

रि श्ते 'जरूर' होते हैं,  क्यों पर मजबूर होते हैं?  जितने नज़दीक हों,क्यों,  उतने मगरूर होते हैं?  रिश्ता मतलब साथ है  इज़्ज़त है, विश्वास है  फ़िर क्या इतना उकसाता है?  क्यों कोई हाथ उठाता है?  अब क्या रिश्ता रह जाता है? क्या सिखा रहे हैं रिश्ते,  समाज धर्म, व्यवस्था  "गर्व करो" जो जैसा जहां  सवाल की जगह,  कहां?  बड़ो की मानो  वो भी नतमस्तक होके परंपरा जानो, मानो  सीता पर शक  द्रौपदी पर बाज़ी,  काट दो नाक कान  अगर नहीं राज़ी  लगा दो इल्ज़ाम  "शूप्रणखा" वो कौन सी दुनिया होगी,  सब की जिसमें जगह होगी?  साथ ही साथी की वज़ह होगी  मोहब्बत इज़्जत से नापी जाएगी  ताकत सरताज़ नहीं होगी,  खुद को बनाने के लिए  दुसरे को तोड़ना नहीं होगा,  दुनिया के नाप से कोई  कम न होगा,  आज़ादी और क्या है?

क्या बात करें?

कोई भी आह दिल तक पहुंच जाए कैसे वो हालात करें, सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! वो दौड़ ही क्यों जिसमें सब पराये हैं, तेज़ रफ़्तार दुनिया और बहुत दूर एक दूसरे से आये हैं, चाल बदलें अपनी और नयी रफ़्तार करें! ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! बच्चों के हाथ क्यों हाथ से फ़िसलते हैं, जदीद* तकनीक है के मशीनों से संभलते हैं (*आधुनिक) बचपन से बात हो ऐसे कोई व्यवहार करें! ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! अगर सोच है अलग तो आप पराए हैं, रिश्तों को सब नए मायने आए हैं,  ख़बर दुनिया की ज़हर जिगर के पार करे! .....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! चल रहे हैं मीलों और अब भी बहुत दूर हैं, आप कहते हैं घर बैठे सो मजबूर हैं, कैसे दर्द मजलूमों के हमको चारागर* करें! (*Healer) ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें! क़यामत है दौर और कोई नाखुदा* नहीं, (नाविक) मजबूत कदम हों खोखली दुआ नहीं वो आवाज़ जो सुकून दे, जिसका ऐतबार करें! ....सुन सकें एक दूसरे को अब ऐसी कोई बात करें!

हिम्मत के हथियार!

हिम्मत के हथियार चाहिए नफरत नहीं प्यार चाहिए अपने हाथों में हो अपनी कश्ती की पतवार , हिम्मत के हथिया र, हिम्मत के हथियार.... कौन कहे किस को बेगाना , मजहब किसने समझा जाना मंदिर मस्जिद की बातों में, नफरत से इंकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... कब तक हम बर्दाश्त करेंगे, मासूमों पर वार सहेंगे दिल में अपने प्यार जगा दे, अब ऐसी ललकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... अपने सबको ही प्यारे हैं , बीच में कौन से दीवारें हैं गुलशन हरसू फूल खिला दें, ऐसे कारोबार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको सबका साथ चाहिए, हर झगडे की मात चाहिए नेक इरादों के मौसम से, ये दुनिया आबाद हिम्मत के हथियार , हिम्मत के हथियार.... सबके दिल में आस चाहिए , उमींदों की प्यास चाहिये मौसम बदलेंगे जब बदलें, मौसम के आसार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हक की सारी बात चाहिए नहीं कोई खैरात चाहिए, चलिए बनें संविधान के ऐसे पहरेदार, हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको खबर ए यार चाहिए दोस्ती भाईचार चाहिए रि...

टिटहरियां!

वक्त के धागे से, याद की सुइयों में दर्द को सीते हैं ! गुजरे हुए मौसम की, सुखी बरसातों को अश्कों से भिगोते हैं! यादों की पतझड़ के, टूटे हुए पत्तों से छुपते छिपाते हैं!  जिस्मानी रातों की, रूहानी बातों के लम्हे जुटाते हैं! चुभ न जाए कहीं, बंद हुई पलकों में सपनों को सुलाते हैं! अधखुली क़िताबों में, गुम हुए शब्दों के मतलब तलाशते हैं! तन्हाई के शोर सुन, खामोशियों की भीड़ में, ख़ुद को गुनगुनाते हैं! तस्वीरें तमाम देख, अपनी पहचान को अजनबी बनाते हैं! अपने साथ देर से, इत्तला के फेर में, दूर सब से जाते हैं! यकीन सारे तय हैं, उसके ही सब भय हैं, ख़ुद की ही सब शय हैं!

आसान रिश्ते!

यूँ आज उनसे मुलाकात हुई, चाह तो बहुत थी पर कहाँ कोई बात हुई, वो डर गए, हम भी थोड़ा सहम गए, पर इरादा उनका भी बुरा नहीं था, हम भी नेकनीयत ले कर रुके रहे, कुछ लम्हे साथ गुज़ारे, उसने हमको देखा, हम भी खूब निहारे, नज़र मिली पर बात कुछ नहीं चली, कुछ हमने समझा, कुछ उसने भी सोच लिया, बस ये मुलाकात, मुलाक़ात ही रही, जो अधूरी थी वो ही पूरी बात रही, रिश्ता यूँ भी होता है, क्या मिला, क्या बना, कौनसा रास्ता,  इस सब से नहीं वास्ता! बस मैं मैं रहा, वो वो रहा, वो अपनी दुनिया में, मैं अपने रास्ते!!

क्या बात हुई?

कल तो जैसे रात ही नहीं हुई, आपकी हमारी जो बात नहीं हुई! बात करके बोले कि बात नहीं हुई, क्या बोलें, ये तो कोई बात नहीं हुई! ख़ामोश थे दोनों क्या बात करें, पर कैसे कह दें की बात नहीं हुई! सुनना था उनको सो ख़ामोश थे, शिकायत, 'ये तो कोई बात न हुई'! नज़रें बोलती हैं, अंदाज़ बोलते हैं, कौन कहता है कि बात  नहीं हुई! कहने सुनने को कुछ नहीं रहा, कौन बताए ऐसी क्या बात हुई? आपकी हमारी जो मुलाक़ात नहीं हुई, क्या कोई बात है? कोई बात नहीं हुई! भीड़ बन गया है हर कोई हर जग़ह राय अलग है सो कोई बात नहीं हुई! "मन की बात" अब सियासत है, बड़े बेमन से मन की बात हुई!

ज़रा

ज़रा सा उनका मुस्कराना है ज़रा सा हमको पास जाना है ज़रा सी भूल हमसे हो ज़रा सा उनको भूल जाना है! ज़रा सी सख्तियाँ उनकी ज़रा सी नाज़ुक मिज़ाजी, ज़रा से बेशरमियाँ मेरी, ज़रा सी हाज़िर-जवाबी ज़रा से रास्ते दिल के ज़रा सा साथ में चल के ज़रा सी उम्मीदें उनकी ज़रा सी मेरी जिद्दें हैं,  ज़रा सी आवारगी में हम, ज़रा से उनके नखरे हैं, ज़रा है साथ ये हरदम,  ज़रा से फ़िर भी बिखरे है ज़रा से अजनबी हम हैं, ज़रा सो वो हैं पहचाने ज़रा सा दूर से देखें ज़रा करीब कब आएं! ज़रा से हम उनके हैं, जरा से वो हमारे हैं, ज़रा सा बह रहे हैं वो ज़रा सा हम किनारे हैं  ज़रा से ज़ख्म उनके भी ज़रा से दर्द हमारे हैं ज़रा सा इश्क ये ऐसा ज़रा से हम बेचारे हैं ज़रा सा मौसम बेइमान ज़रा सी सफ़र कि थकान ज़रा सा हाथ कंधों पे ज़रा सा काम यूँ आसान

रिश्ते मैं तो हम आपके.....

रिश्ते ज़ंजीर है किसी को किसी को शमशीर हैं मज़ाक हैं किसी को किसी को पूड़ी खीर हैं किसी को मज़बूर करते हैं किसी को मजदूर किसी को चकनाचूर कोई फलता है,कोई पलता है सही रस्ते चलता है कोई घर से भाग निकलता है कोई इंसाँ से रखता है कोई इंसाँ से बचता है किसी को कुत्ता प्यारा है कोई घोड़े का चारा है कोई फूलों में रमता है कोई उड़ान भरता है बिन रिश्ते इंसान नहीं, जरुरत पर भगवान बनाता है मरे को शमशान बनाता है अपना काम आसान बनाता हैै मतलब का सामान बनाता है बुढ़ापे की लाठी घर की शोभा छाती का बोझा कलाई का धागा मस्त माल मख्खन जैसे गाल बाजारू खरीद दहेज़ के साथ मिली मुफ़्त चीज़ और रिश्ते खून के थाली में मिली नून के जी का जंजाल, खाल के बाल बोले सो सुनो कहे सो बनो, सपने बड़े चुनते हैं छोटे घुनते हैं रिश्ते आज़ाद करते हैं इरादों को बाज़ करते है कामयाबी को ताज करते हैं पीठ को हाथ करते हैं अकेले में बात करते हैं रिश्ते बांधते हैं रोकते हैं हर नए कदम को टोकते हैं पर काटते हैं, आपस में बाँटते हैं रिश्ते झगड़ते हैं, बिगड़ते हैं ...