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रोज़ होते कम!

कितने टूटे हैं हम, कितनी दरारें हैं, रिस रहे हैं  हज़ार जगहों से, लाख वजहों से, कितने कम पड़ते हैं, अपना कहकर, अपनों से लड़ते हैं, छीन लेने को,  उनका यक़ीन, उनका प्यार ज़ख्मों का कारोबार, हिंसा का सिक्का, इतना डर? कैसे इतने हम खर्च हो जाते हैं? खुद को भी बचा नहीं पाते हैं? दुनिया की बंदर बांट में, फिट होने को, बहाना! खुद को तराशते हैं।  सच कुछ और! ख़ुद को ही काटते, छांटते, नापते, हर मोड़ कुछ और कम हो जाते हैं, और फिर  ख़ुद को ही ढूंढते हैं, ज़हन में दरबदर घूमते हैं, न ख़त्म होने वाली तलाश, हमारी लाश! कितने हम बिखरे पड़े हैं, टुकड़ों में,  हर जगह, घर में, दुनिया में, अकेले में, काम पर, दोस्तों के साथ, हर जगह,  अधूरे बड़े हैं, हर लम्हा पूरा होने, खर्च होते हैं, चमक चुनते दुनिया कि, अपने अंधेरों को शर्माते हैं, अपने सामने, खुल कर कब आते हैं? नाम कमाने को अपना, ख़र्च हुए जाते हैं, बड़े सस्ते  खुद को निपटाते हैं! भीड़ में एक नाम? जय श्री!!!

बेकल मन!

मैं उदास हूँ, कल था, आज हूँ, आस हूँ, प्यास हूँ, उम्मीद से हताश हूँ, मैं ख़ास हूँ, फिर भी, अपने ही सवालों से बदहवास हूँ, अकेला, अपने साथ हूँ, और भी हैं, बात करने को, पर आखिरकार दिन लंबे हैं और रात, बोलती है, और न जाने कैसे, दिलोदिमाग  के सारे अंधेरे कोनों में गूंज उठती है, उनका सामना करती अपनी ही मुस्कराहटों से थक चुका हूँ! सच चुका हूं! अपनी कामयाबी से,  जो मेरे चारों तरफ है, सामान बनकर, जेब में पड़ीं दीवारों पर जड़ी, लाइफ़ साइज़ तस्वीरें,  मुझे ही क्यों छोटा करती हैं? कितनी चमक है मेरी, मन बहलाती कभी मुझे ही झुठलाती, आगे क्या है? मेरी क्या वज़ह है? मेरी क्या जगह है? सपने, जो मैंने पाले हैं, दिल पर उसी के छाले हैं! अपनी ही मुस्कराहट से उदास हूँ, लगता है अपने पास हूँ, और दूर तक रास्ता नहीं कोई, इसलिए चलता हूँ! बहुत उलझाते हैं ख़याल, सवाल, इसलिए निकलता हूँ! यही एक रास्ता दिखता है, जो मुक़म्मल है! इसमें कहाँ कोई कल है, आज मन बड़ा बेकल है! चल!

तलाश, तलाश की!

वो रोशन रात थी या उज़ालॊं की लाश थी बुलंद इमारत, कामयाब इबारत, अंदाज़ जश्न के, और इतनी रोशनी कि सच्चाई जल गयी, ठिठुरती बेबसी अधनंगी सी, कैसे पल गयी, "काश” होती एक जिंदगी, जैसे गड़्ड़ी से फ़िसल गया ताश कोई, बेसब्र नज़र इस आस में‌, कि मिलेगी तलाश कोई, और हम बस चल रहे हैं, एक और शाम, और हम निगल रहे हैं, अंदाज़ भी है, एहसास भी, इरादे भी, फ़िर भी सहारा दे नहीं पाती, तिनका हुँ? पर खुद भी बह रही हुँ, किनारा होने को . . . . क्या नहीं दे दुं! नज़रें बेबस से नहीं मिलीं, पर खुद की बेबसी संभल गयी, एक रास्ता नहीं मिला, पर अपनी सुबह को रोशनी दिखा दी, कैसे कहुँ मज़बुरी थी, मेरी नज़रॊं ने आज़ मेरी उम्मीदें जगा  दीं ! आमीन ! (किसी की एक शाम की चहलकदमी से चुराये हुए ज़ज्बात)