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सुबह!

उस मोड़ पर सुबह थी,  उस छोर पर सुबह थी, किसी रात की सुबह थी, कुछ बात है सुबह थी, घनघोर बादल के साथ, या उन्हें छोड़ कर सुबह थी? बावजह थी या बेवजह, सबके साथ ये सुबह थी.. आप कहां हैं, कहां आपकी सुबह थी? जाग रही थी साथ,  या दूर भागती सुबह थी? उस मोड़ पर हम थे, हाथ आयी सुबह थी, मिला रही थी कांधे, एक रास्ता सुबह थी, दिला रही थी यकीन, सहर से शाम सुबह थी, रखी थी पीठ पर हाथ, बड़ी इफरात सुबह थी!

किसका खेल?

  सब साथ के खेल हैं, जाने-अंजाने  चाहे– अनचाहे, गाहे–ब– गाहे  सवाल ये है, कि  आप कैसे खेल रहे हैं? दुनिया की चाल चल, फेल रहे हैं? . या, अपनी मर्जी से मेल रहे हैं? आप काफ़ी हैं या कम? आइने क्या बोल रहे हैं? तराजू किसका है और, किस हाथों तौल रहे हैं? सुना होगा,  दुनिया एक होड़ है, चूहे वाली दौड़ है, लगे रहो, एक दो एक, एक दो एक... सवाल ये है कि  चाल किसकी है ? आप चुन रहे हैं मोड़, या रस्ते आपको मोड़ रहे है? आप खेल रहे हैं, या खेल किसी और का, आप झेल रहे हैं? आप कैसे खेल खेल रहे हैं?

ज़ज़्बा ए इम्कान!

ज़मीन देखिए हमारा आसमान देखिए, हल्की सी चहरे पर मुस्कान देखिए, मुश्किल है! तो क्या आसान देखिए! सफर का सारा इंतज़ाम देखिए! एक हम ही नहीं है हमसफर उनके, जो आप उनके तमाम काम देखिए!! क्यों नहीं हो सकता आसमां में सुराख, इस जज़्बे पर रवैया इम्कान देखिए! कितनों को हांसिल है हमदिली उनकी, दिल का उनके खुला मैदान देखिए!! शोहरत से फिर भी ख़ासा डर है, कोई कह न दे 'अल्हा!' "बड़ा काम" देखिए! *Imkan - possibilities

सुनने की सर्दियाँ!

हमारे अंदर जो बेशकीमती है, उसे अछूता रहना है हमारी सोच से जो हमारे होने को कम करती है| उम्दा होने की जो हमारी लड़ाई है, उससे नहीं बनी नन्हे फरिश्ते सी मनचाही हमारी बानी| जो विचलित करती है फिर अपने पनपने को उस सब के साथ जो जरूरी है| खुद की वो बात जिससे हमे नफ़रत है, और हमें नहीं पता कि वो हममें कहाँ है पर जो तरीकों में नज़र आए, उसको समझाने की जरूरत नहीं| हर किसी के भीतर एक असीम आनंद की किलकारी है जन्म लेने को तैयार| और यहां बड़बड़ाती रात में मुझे सुनाई देती है, अखरोट पेड़ की बच्चे के पालने ऊपर लहलाहट, अपने अंधेरी शाखाओं से हवा में और अब बरसात आकर मेरी खिड़की पर दस्तख़ देती है और कहीं और तारों और हवा की इस ठंडी रात में, वो पहली बुदबुदाहट है, उन छुपी और नज़र न आने वाली वसंत कि अंगड़ाई की, ठहरी गर्मी की हवा की वजह से, हर एक अभी तक अकल्पित, सर उठाती हुई!!

मुमकिनियत!

बचपन में बड़ों के हाथ मनमारते, अब खुद की हद के ख़त्म होते हैं, खुद से जिद्द क्यों नहीं कर लेते, क्यों आप दुनिया को हज़म होते हैं! इतना भी एक रस्ते न चलिए, के खत्म हों पर खबर न हो?    अपने ही जख़्म हुए जाते हैं, क्यों यूँही ख़त्म हुए जाते हैं!    अपने ही आइनों से सब शिकायत है, क्यों खुद को ही ख़त्म हुए जाते हैं! नसीहतें तमाम कुछ न करने की, नेक इरादों के खत्म हुए जाते हैं! नेक नसीहतें आपके रस्ते आती हैं, और आप शराफ़त के खत्म होते हैं?   पहचाने रास्तों पर सफ़र नहीं होते, अपनी ही चाल के हम ख़त्म होते हैं हर मोड़ किसी से मिल लीजे, ज़िंदगी अजनबी है, संभल लीजे? आग़ाज़ कुछ नहीं ख़त्म होने की बात है, उनसे पूछिये जिनको सिर्फ दाल भात है!   बड़े हुए हाथ सहारा भी होते हैं, आप क्यों शक के ख़त्म हुए जाते हैं! ज़िन्दगी से शिकायत नहीं की जाती, अपने ही हाथों से खत्म क्यूँ होते हैं? सपने में तो आप के भी रंगी पंख होंगे, क्यों अपनी हकीकतों के ख़त्म होते हैं?

बूंद बूंद तिनके, आसमां चुन के!!!

कोशिश नापिये, वही मंज़िल जाती हैं, हर कोशिश अंजाम है, क्यों 'मुश्किल'पहचान है! रेत के भी महल होते हैं, इरादे घड़ियों से न नापो! हर तिनका आसमान है, गर उसे अपनी पहचान है! हर पत्ता हवा है, उसको रुख पता है! हर बून्द समन्दर काबिल है, हर तहज़ीब बड़ी ज़ाहिल है! नज़र हो तो बून्द समंदर है, समझो क्या आपके अंदर है! बिना जमीं के आसमान कुछ नहीं, मुश्किल न हो तो आसां कुछ नहीं!

ज़रा ज़रा!

जरा सा मुस्कराना उनका नज़रें फ़िराना ज़रा सा ज़रा सी हौंसला आफ़ज़ाई तड़पाना जरा सा जरा सा बल खाना, लड़खड़ाना जरा सा जरा सा छेड़ना, तड़प जाना जरा सा जरा जुल्फ़ों का उड़ना, बिखर जाना जरा सा दिले आबाद का, दिले-बरबाद से फ़र्क जरा सा ज़रा सा एक बड़ाये हाथ, साथ एक दे ज़रा सा मुश्किल नहीं मुसाफ़िर, सफ़र जिंदगी का ज़रा सा ज़रा सी आकांक्षायें और लालच ज़रा सा बहुत है, इंसान का बहक जाना जरा सा ज़रा सा हौसला रखना, हिम्मत ज़रा सी ज़रा सा गम, ज़रा खुशियाँ, ज़िंदगी ज़रा सी ज़रा से उनके सपने हैं ज़रा हमने भी देखे हैं, साथ था, फ़िर भी रात सो लिये ज़रा सा! ज़रा सा जज़्बा चलने का, साथ कुछ दूर तलक ज़रा सी कोशिश किसी मोड़ कोई और फ़लक!