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दुनियादारी!

रंग हर एक को, एक जैसे नज़र नहीं आते,  खाली पेट फ़ीके रंग, भरी ज़ेब चटक जाते! खुद से आप किस ज़ुबान में बोलते हैं,  थपथपाते हैं पीठ या हमेशा तौलते हैं? सुनते हैं, क्या, चुनते हैं, अनसुना करते है!  युँ भी हम सोच का तानाबाना बुनते हैं!! दुनियादारी ज़ंजीर है गुलामी की,  समझदारी वो जो आज़ाद रखे,  एक ही तरीके सब के बात मशीनी है,  बात वो जो आपको बेबाक रखे! खुद को कम करने के हज़ार नुस्खे हैं, बाज़ार भरे हुए हैं बदलते रंगों से! कुछ चाह कर बदलते हैं, कुछ आह कर, कराह कर कुछ न बदले बदलते हैं, की दुनिया उनकी बदल गई!   शाबाशी दे कर गिरफ़्त में लेती है, ईनाम में जो मज़ा है, एक तरह की सज़ा है, लगाम पर आपकी हाथ किसका है? आप की दुनिया क्या, किस दुनिया के आप, आपके हैं दायरे या, किन्हीं दायरों में आप!

ख़ामोश, तानाशाही अभी जारी है!!

पूरी अवाम को गुनाहगार कर दिया, सत्ता ने ताकत को हथियार कर दिया, रोज लाखों की छाती पर मूंग दल रही है, घटिया मज़ाक है, जो संसद में शायरी चल रही है। बच्चे भी गुनहगार हैं, दादी भी गुनहगार हैं? किसी को कोई हक नहीं, आवाज़ कोई भी जेल की दीवार है? और बाकी मूल्क जैसे गूंगा है, जैसे कश्मीर कोई दूजा है, अपने से जुदा, अलग, उनसे हमें बस लेना है देना कुछ नहीं, हर इंसान को इंसान कहने की वज़ह नहीं, जो अपना नहीं उसका कोई सपना नहीं? क्या अब भी आपको ये सवाल है? कश्मीरियों को कश्मीर क्यों चाहिए? https://m.timesofindia.com/entertainment/hindi/bollywood/news/zaira-wasim-kashmiris-continue-to-exist-and-suffer-in-a-world-where-it-is-so-easy-to-place-restrictions/amp_articleshow/73929642.cms