बहुत चलाली,दुनिया, तूने! चलो आज थोड़े हम हो जाएँ! अपने लिए ही तो है, क्या फ़िक्र जो थोड़े कम हो जाएँ! घूम रहे हैं या खुद को ढूंढ रहे हैं, अपने ही कानों में बहुत गूंज रहे हैं! पास आ गए अपने के दूर हो गए? आईने कुछ ऐसे चकनाचूर हो गए! नज़र में हैं खुद की और खुद नज़र आते हैं, अक्सर हम बड़े खुदगर्ज़ नज़र आते हैं! यूँ अक्सर हम, हम ही होते हैं, कभी ज्यादा तो कभी कम होते हैं! खुद के खारिज़ हैं अक्सर, क्या शिकवा करें ज़माने से! पुछ रहे हैं अब क्या होगा, अपने ही अफ़साने से! अपने ही शौक़ीन न हो जाएँ, आईने कहीं मेरे यकीं न हो जाएँ! लगे है रोज "Like" गिनने में, ड़र हैं कहीं कमी न हो जाये!
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।