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अंधे आसमाँ 3

मेरी प्यारी बर्बादी अपने लिए अपनी ही हवस , ख़ुद को बनाएगी या मटियाएगी? एक हक़ीकत मेरी , मेरी कितनी सच्चाइयों को निगल जाएगी? मैं कम हूँ या ज्यादा कम? रिजल्ट हूँ अपना , या दुनिया का थन , किसी के हाथों निचुड़ता , पिघलता , रहने को आजाद , और बहने से बर्बाद? क्यों ने अपनी बर्बादी अपने हाथों ले लूं?

आज़ादी किस से?

खुद से छुपने को आईने पे टिकते हैं , अपने ही हाथों बड़े सस्ते बिकते हैं ! सफ़ाई देने को तमाम बातें कहते हैं , अपनी ही गंदगियों से मूँ फ़ेर रहते हैं ! बढा - चढा के बातों से शान करते हैं , वतन परस्त सच्चाई बदनाम करते हैं , मुख़्तलिफ़ राय है नाइतिफ़ाक करते हैं , क्यों शिकन है जो यूँ आज़ाद करते हैं एक ही इबारत है सब बच्चे बेचारे पड़ते हैं , फ़िर क्यों आज़ादी के इतने झंड़े गड़ते है आज़ादी के गुलाम सारे एक चाल करते है , सच साफ़ न हो जाये कम सवाल करते हैं ! जख्म नासूर हो गये है माँ के दामन तले देशप्रेम सब क्यों आँखों पर पर्दे करते हैं!  बेगैरत अपने ही मज़हब के अमीर सारे , देख दुसरे को क्यों मुँह में लार करते हैं ? मुख़्तलिफ़ - different ; नाइतिफ़ाक - Disagree; इबारत -writing style

जश्न-ए-गुलामी!

चलो गुलामी के जशन बनाएँ वही ठीक है जो होता आया है, स्थिरता कितनी अच्छी चीज़ है, सब कुछ वही....! सही! ज़माना खराब है, नयी चीज़ क्या भरोसा? आज़ादी? बाप रे बाप! आज़ाद खयालात? यानी, सारी मुसीबतों की जड़! छूट जायेगी, बनायी है जो पकड़, बचपन से अब तक, कितनी मेहनत से, भावनओं में जकड़ आश्रित बनाया है, पालन-पोषण का यही सरमाया है, जी जान से किया है अपने पैरों पर खड़ा, उम्र लग गयी, भरने में खाली था घड़ा! कहते हैं, सोच को खुलने दो ख़बरदार, वर्षों की मेहनत मिट्टी में घुलने दो? आखिर कुछ सोच-समझकर ही सब कुछ “तय” है! दुनिया चल रही है, क्योंकि दिलों में भय है! आज़ाद हुए खयालात, तो डर भूल जायेंगे कड़वे सच, व्यवस्था के ठेकेदार कहाँ पचा पायेंगे, बात बढ़ जायेगी, जंग छिड़ जायेगी, और हम अमन पसंद हैं नाक-बंद कर लेंगे, अगर सामने गंद है, दुनिया जैसी है, वैसी ही रहने दो, कुछ आजाद खयालात, गुमशुदा होने दो, अच्छा है! जो “त्याग” करना, संस्कृति की शान है, दो पल शांत , सर झुकाएं चलो! गुलामी का जश्न मनायें!