ये शबाना है , हिम्मत , लगन को दुनिया में रहने का बहाना है , मुश्किल है फ़िर भी मुस्कराना है , कल की बात बेमानी है , आज़ को आज़ ही सुलझाना है , और तरीके अपने , (मक्का मस्ज़िद, हैदराबाद में शबाना अन्य महिलाओं को ऐरोबिक्स करा रही हैं) ( दुसरी क्लास में शबाना स्कूल छोड़ दी क्योंकि उऩ्हें टीचर से इज़्ज़त नहीं मिली ) दुनिया तो हर तरीका आज़मायेगी , (बुरके की परिभाषाओं को बदलते हुए शबाना) कभी फ़ुसलायेगी , कभी ताकत आज़मायेगी , कभी नाउम्मीदी के सपने दिखायेगी , पर ये दाल यहां नहीं गलेगी , कुछ करना है , नया ही सही , ड़रने कि लिये पूरी जिंदगी पड़ी है , (13-14 साल की उम्र में शबाना अपने को 16 मानकर / जानकर प्ले फ़ॉर पीस ( www.playforpeace.org ) कि सदस्य बनीं और पुराने हैदराबाद की संकरी गलियों में बच्चों को मुस्कराने , हँसाने लगी !) गुड़मॉर्निंग , फ़ोलो मी जैसे कुछ लफ़्ज़ बोल इंग्लिश मीड़ियम स्कुल में भी जानी जाने लगी , ड़र तो था , पर अपने से मुहब्बत कैसे छोड़ दें , हर एक मकाम पर आकर भी , “ बस अब एक और सपना है " सोच ने रोक...
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।