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हमसफ़री के 18-19

  फांसले अब भी आसाँ हैं नज़दीकी अब भी मेहमान इश्क के मुसाफ़िर हम हमसफ़र, आज हम जवान हैं फांसले दूर नहीं करते नज़दीकी मज़बूर नही करती इश्क के मुसाफिर हमसफ़र अपनी एक जुबां है करवटें अब भी नादाँ हैं इश्क अब भी शरीर एक काहिल और एक काबिल बात बाक़ी है इश्क जायज़ है रिश्ता नाजायज़ तमाम वज़ह ज़ारी आज़माइश रास्ते एक हैं फ़ितरतें अलहदा इश्क के मुसाफिर हम हमसफ़र अपनी एक अदा है हमसफ़री के १८-१९  जवाँ हुए हैं इन दिनों, हमतलबी के शिकार,  अपने मर्ज़ों की हमदवा हैं! साथ-सफ़र का सामान क्या वादों की जरूरत क्या तज़ुर्बे सब रस्ते मिलेंगे और सस्ते, मुश्किलें इरादे अब भी नादाँ हैं, इरादे अब भी आसाँ हैं, इरादे अब भी झांसाँ हैं, इश्क के मुसाफ़िर, इरादे अब भी सामाँ हैं!

ना-शाईस्ता इश्क!

होगा इशक आपको दिल फ़ेंक कर मत दीजे , जो भी इज़हार है आँखे सेंक कर मत दीजे घूर के आँखों से उपर नीचे तक नापते हैं ,  क्या घर जाकर अपने बिस्तर जाँचते हैं ? सीटी मार के क्या संदेश भेजते है इज़्ज़त है नहीं तो क्या बेचते हैं ? मर्द होने की ये कौन सी निशानी है , तंग पतलून और हाथों की परेशानी है ? शराफ़त से घर अंदर भाई - बाप - बेटे हैं , बाहर क्यों ललचाए शीला की जवानी है ? मर्द भेड़िया है पतली गली में और कुत्ता शेर बिना भोंके लपकता है ज़रा मनाओ खैर ! कलाई मोड़ कहे रांझना कि इज़हारे इश्क है , इन ना-शाईस्ता सच्चाईयों से बदनाम इश्क है ! मोहब्बत की निशानी ताज़महल आगरा है , झूठ ! आज - कल सुना है इसका नाम वाईग्रा है ! भीड़ में धक्का , पीछे से चुंटी , और हाथ की सफ़ाई , महामारी हिंदूस्तान की और नाम इसका मर्दाई ! (ना-शाईस्ता - Obscene)

उंसीयत

बांध लो तो मैं हुं , छोड़ दो तो मेरी उंचाईंयां , किसने समझी जहां में उंसीयत की गहराईयां। रोक लो तो मंजिल , साथ दो तो रास्ता , जिंदगी के सफ़र की हैं बड़ी दुश्वारियां , चल रहे तो सफ़र है, रुके गये मकाम कोई, हाथ में बस हाथ है, क्यों और सामान कोई? धुप जलने को नहीं , न छांव बुझने को , पनपने देती नहीं हमें रिश्तॊं की परछाईंयां। आज़ तुम खफ़ा हो कल हमारी बारी है , आसां नहीं समझना रिश्तॊं की बारीकियां। मेरी खता नहीं , कहते हैं वो , मेरी भी नहीं , ले डूबेगी उंसीयत को अंह की बीमारियां। जमीं - जमीं रहे और हो आसमां बुलंद। उंसीयत एसी जो करे दो जहां बुलंद।। ठहर जाये किसी वज़ह किसी मोड़ पर ये रिश्तॊं की पहचान नहीं। न उड़े पंछी तो आसमान नहीं , बिन उंसीयत के बागवां नहीं।।  इससे अच्छी क्या बात हो,  अपना साथ ही हालात हो!

छलकते लम्हे!

युंही कोई बात नहीं होती, युंही कोई साथ नहीं होता फ़क्त ईरादे नेक रखिये, हर लम्हा हालात नहीं होता! वही पुरानी बात है, वही काली रात है, लम्हों का साथ है, शब्दों की बारात है!  दो पल गुम हुए, दुनिया घुम गयी किस ओर, डोर पकड़े बैठे थे, हाथ रह गयी एक छोर!  लम्हों का असर हो, लम्हों का कहर हो, ज़ुबाँ बयाँ करती है, जो लम्हों को नज़र हो!   खोये हैं देर से, या लम्हे युं ही सोये हैं कैसे काटें अकेले जब साथ बोये हैं!  क्या आप अपने लम्हों के सच्चे हैं,  या इस हिसाब में थोडे कच्चे हैं, लुड़क रहे, दिल ने जो दिये गच्चे हैं, क्या कीजे इश्क़ में हम बच्चे हैं!