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कारवां की तन्हाई!

कारवां कितने मासूम सफर मोहताज़ हैं,   हिफाज़त के कैसे देखेंगे अंजान ,  आँखों पर पर्दों कि आदत के ! गुलामी के दौर हैं चलो यही जश्न करें , सुनने को कान नहीं हैं, क्या प्रश्न करें? कवायत जारी है , दो कदम चले चलो , ताक में रखो सोच , हाथ बस मले चलो ! लेकर काँरवां चले थे , रह गयी बस रहगुज़र , कसर साथ में रह गयी ,  या साथ का ये असर ! तन्हाई सवाल बचपन के लिये सफ़र करते हैं , कुछ लोग ऐसे हैं ता - उम्र असर करते हैं ! किसको माफ़ करें , कहां मलहम लगायें , नस्ल कौन सी हो , फ़सल कहां उगायें ? जामा पहनते हैं दिखावट का ,  खुद ही खुद को मंजुर नहीं हैं , इश्क़ तो तमाम करते है ,  गोया मोहब्बत का शऊर नही है ! आखिर कब तक हमें इंसां होने का फ़कर होगा , हरकतों पर झुके सर , कब ऐसा जिगर होगा ?

दाखिले!

निकले हैं सफर को झोली भर के चल मुमकिन है सेहरा में कोई प्यास मिले ! मुतमईन है सब अपनी जोड़ तोड़ में अपने ही हाथों सब को वनवास मिले अपने साथ के लिये तन्हाई नहीं लगती खो जाये भीड़ में वो एहसास मिले जिंदगी भर साथ, सिर्फ जिंदगी देती है उतना ही दीजिए जितना रास मिले दुआओं की क्या जरुरत जो आपका साथ मिले  उम्मीद चाँद की और पूरी कायनात मिले  दिलोदिमाग मिले तो इस अंदाज़ से मिले एक कतरा अश्क का एक संजीदा बयां मिले जिधर से गुजरे एक कारवां बना चले   आज ये रास्ता उदास मिले