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क़ाबिल सफ़र!

एक सफ़र के पुरे हो गये, ज़िन्दगी को ज़रा अधूरे हो गए, बाँट आये लम्हे अज़ीज़ कई मोड़, और चंद रिश्तों के मज़बुरे हो गए! अंजान जगह थीं और, हर कोई अपना निकला, सच जो भी आया सामने, सपना निकला! अज़नबी बन बन यक़ीन सामने आते रहे, काम अपना था और अपने काम आते रहे हर लम्हा लोग मुस्कराते रहे, यूँ सब अपनी बात समझाते रहे। अपने इरादों के सब काबिल निकले, हमें उस्ताद कहें ऐसे सब फ़ाज़िल निकले! आ जाइए तशरीफ़ लेकर जब मर्ज़ी, दावत है, सीख़ ही जायेंगे कुछ तो, रवैया है, आदत है और एक सफ़र मकाम हो गया,  मुसाफ़िर का काम आसान हो गया! इतने ठिकाने मिले दिल घर करने को,  अपने से ही हम ज़रा बेगाने हो गये! अधूरे फ़िर अपने फ़साने हो गये,  कुछ वो बहके कुछ हम दीवाने हो गये!

अंजान तारुफ़

अंजान तारुफ़  सड़क , लोग , मौसम, हवा, हँसी ,  रुकना, चलना, बोलना,  खाना, पीना, छोड़ना ,  ट्रेफिक की बत्ती , रंग बदलती पत्ती ,  यकीन, खुद में, खुदा में , रिश्ते,  नज़दीकी और दूर के,  उम्मीदें , आकांक्षा, आजादी, हाथ की और हकीक़त ,  खुली लाईब्ररी, सहूलियत या तबीयत? रुकती कारें , चलते कदम,  कायदे,  सोच : हमें मालुम है,  सोच या हमें मालुम है_ _ _? सीमित, संकुचित,  दुनिया और भी है, यही होना चाहिये,  सही है? खुश होना चाहिए,  पर तमाम सवाल हैं  मौज़ूद  और मुश्किल  जहाँ सवालियत नहीं है  नज़र एक काफी नहीं है,  तमाम चाहिए,  तारुफ़ अंजान ही बेहतर है,  पहचान चौखटा बना देती है,  शराफत इसी में है,  सच को फैला नहीं सकते  तो भुला दें,  हर लम्हा एक नयी शुरुवात हो, आपसे मिलकर खुशी हुई! आप कौन??????