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कुछ याद सा!

पास है मेरे पर खो गया है! क्यूँ आज ऐसा हो गया है!! दूर है पर महसूस करती हूँ! क्यों मैं ये अफसोस करती हूँ!! अपना था और अपना ही रहा! हक़ीकत, अब सपना सा रहा!! भूलने को तो कुछ भी नहीं! एक साथ था अब याद सा रहा!! आवाज़ अब भी मेरे कानों में है! फिर क्यों सोचूं क्यूँ गुम सा है!! मेरी हँसी थोड़ी अकेली पड़ गई! खिलखिलाहट का मज़ा कम सा है!! उम्मीद, हिम्मत, कोशिश सिखाई! बहुत है फ़िर भी ज़रा कम सा है!! मेरा बचपन ओ जवानी भी था! वो अक्सर मेरी कहानी सा था!! चल पड़ी हूँ अपने रास्तों पर मैं! हर मोड़ कुछ अकेलापन सा है!!

क्या कहेंगे?

(दोस्त- एक और लड़ाई केंसर में खो गयी, मेरी एक दोस्त जो इतने सालों इस लड़ाई में मेरे साथ थी _ _ _हकीकत को सपनों में ओझल होते हमने देखा है _ _ _ मैं -इस क्षति को हम क्या समझेंगे, सुनने कि बस एक कोशिश है ये अनुराग) हौंसले गुम हैं इश्तेहारों में कहीं, जो खबर है उसकी जगह कहाँ रस्ते गुज़र गए और चंद हमसफ़र भी, मंज़िलें का क्या करेंगे मुसाफिर? साथ भी है, मुश्किलों में हाथ भी हैं, जो बात खुद से करनी है उसका क्या? अफ़सोस बहुत है उन के गुजर जाने का याद आती है अश्कों में और मुस्करा देते हैं! दर्द समझने के और, और, कुछ समेट रखने के वो एक खालीपन सा है जो अनछुआ सा है! ज़िन्दगी ज़ीनी भी है और पीनी भी है, चादर ओढ़ी जो है जो भीनी सी है! नज़र आ जाएंगे हम जो आप गौर करें, मेरी मुश्किलों से मेरी पहचान न हो! वो लम्हे जब हम खुद को न देख पायें, जो करीब है वो भी बड़े दूर नज़र आयें! काश मुश्किलें मेहमान होतीं,  ज़िंदगी थोड़ी आसान होती!

दर्द है!

(दोस्त - कुछ ज़िंदगी को महसूस करने वाला सुनाओ? ) दर्द से दोस्ती नहीं करनी, और दुश्मनी होती नहीं हमसे, मासूम बन गए हैं ऐसे सब दर्द हमारे हिम्मत रखो मत कहिये, कुछ काम की नहीं, बस दो लम्हे आकर साथ मुस्करा दो मैं बीमार नहीं, बीमारी जबरन पास है, प्यास थकी जरूर है पर कम नहीं हुई! मैं आसान हूँ पर मुश्किल में पड़ी हूँ, मैंने सीखा ही नहीं यूँ बेबस होना! (दोस्त - दिमाग में घुस गये हो क्या?) आपने रास्ता दिया, ज़ज्बातों से वास्ता किया, थोडा बहुत हम सब ने एक दूजे को ज़िया है! दर्द आसान हैं गर कोई सुन ले, कम नहीं होते पर संभल जाते हैं! गुजर रहे थे यहीं कहीं एहसास आपके, मैं दुआ कर रहा था तो हाथ आ गए! हम कुछ भी नहीं और आप भी, न हमको ही खबर है, और न आप को कुछ पता दर्द कितना अकेला कर देते हैं, अपना ही साथ देते नहीं बनता! हम भी जोश हैं, मज़ा हैं, अंदाज़ हैं, साथ रहते हैं सब पर कोई नहीं गिनता तमाम नसीहतें मर्ज़ की और मिज़ाज़ के नखरे, किसी का भी साथ देते नहीं बनता ! (एक दोस्त जो केंसर का दरिया पार कर चुकी है, और उसके रेड़ियोधर्मी इलाज़ के साईड़-एफ़ेक्ट्स से अक्सर किसी दर्द से जूझती र...