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मन के मौसम!

  मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, बादल ले कर आसमां आ रहे हैं, रंगों को कुदरत से छलका रहे हैं, ब्रशस्ट्रोक हवाओं के लहरा रहे हैं, कैनवास पल–पल बदल आ रहे हैं, ज़मीन पैरों तले पिघला रहे हैं, खड़े हैं जहां, वहीं बहे जा रहे हैं, मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम जहां जा रहे हैं! पहुंचे थे पहले पर अभी आ रहे हैं मूर्ख हैं जो वक्त से नापने जा रहे हैं, खर्च वही है सब जो कमा रहे हैं, दुनिया कहेगी के गंवा रहे हैं, और जागे हैं जब से जो मुस्करा रहे हैं!

एक एक कदम!

हर कदम  पूरा सफर है, उसके बिना  अधूरा सफर है, पहला कदम  शरुवात है, पूरी, दू सरा,  इरादों की मंजूरी, तीसरा, नीयत जरूरी, और एक कदम, काबिलियत और एक कदम तैयारी, जज़्बा, हिम्मत, कुव्वत, शौक, पूरा होश, और जोश, एक और, और एक, साबित कदमी कुछ और यकीन, और, कुछ मोड़ आख़िरकार  सामने नज़र, चंद और कदम और चार कदम जरूरी, तीन कोस दूरी, दो बातें अधूरी, एक होती जिस्म और रूह , अंत है या शुरुवात, फिर किसने रोक रखा है? बस एक कदम  पूरा करिए, सामने है, दूरी पूरी करिए, बस एक कदम, वो ही सफर है, वो ही दूरी, वो ही जरूरी, बात उसी से पूरी, बाकी सब बातें हैं अधूरी!

निर्माण गीत a Mary Oliver poem

गरम मौसम कि एक सुबह,  बैठ, एक टीले के नीचे एक जगह,  मैं सोच रही था ‘ईश्वर’! समय सदुपयोग के लिए  एक अच्छी वज़ह!! नज़र आया एक मात्र कीड़ा,  टीले की रेत को सरकाती इधर-उधर, लुढक-पुढक,  भरपूर जोश,  विनम्र सोच! उम्मीद है ये हरदम ऐसा ही रहेगी, (यही दमखम) हम में से हर एक  अपने रास्ते चलते इस जग को रचते!

क्या कहेंगे?

(दोस्त- एक और लड़ाई केंसर में खो गयी, मेरी एक दोस्त जो इतने सालों इस लड़ाई में मेरे साथ थी _ _ _हकीकत को सपनों में ओझल होते हमने देखा है _ _ _ मैं -इस क्षति को हम क्या समझेंगे, सुनने कि बस एक कोशिश है ये अनुराग) हौंसले गुम हैं इश्तेहारों में कहीं, जो खबर है उसकी जगह कहाँ रस्ते गुज़र गए और चंद हमसफ़र भी, मंज़िलें का क्या करेंगे मुसाफिर? साथ भी है, मुश्किलों में हाथ भी हैं, जो बात खुद से करनी है उसका क्या? अफ़सोस बहुत है उन के गुजर जाने का याद आती है अश्कों में और मुस्करा देते हैं! दर्द समझने के और, और, कुछ समेट रखने के वो एक खालीपन सा है जो अनछुआ सा है! ज़िन्दगी ज़ीनी भी है और पीनी भी है, चादर ओढ़ी जो है जो भीनी सी है! नज़र आ जाएंगे हम जो आप गौर करें, मेरी मुश्किलों से मेरी पहचान न हो! वो लम्हे जब हम खुद को न देख पायें, जो करीब है वो भी बड़े दूर नज़र आयें! काश मुश्किलें मेहमान होतीं,  ज़िंदगी थोड़ी आसान होती!

कुछ करते हैं!

  इरादे ताकत करते है, इरादों कि इबादत करते हैं, जो सामने है वही सच है, इस बात से हम बगावत करते हैं, मोहब्बत ज़ाहिर करते हैं, कलम सर को हाज़िर करते हैं, उनकी बात उन्हीं को नाज़िर करते हैं, कोई शक! काफ़िर करते हैं   पसंद, दावत करते हैं, काम, कवायत करते हैं, छुट्टी, शायद करते है, कुछ नहीं तो करामत करते हैं!  जो सोचते हैं सच करते हैं, मुश्किलें आयें तो पच करते हैं, शक सामने हो तो 'च्च' करते हैं कभी कभी टू मच करते हैं! रवायत को हम 'धत' करते हैं, मज़हबी बातों को 'But' करते हैं, आप करिये हम हट करते हैं, बात सच है सपट करते हैं!   रास्तों को घर करते हैं, मकाम साथ सफ़र करते हैं, अकेले नहीं हमसफ़र करते हैं, आईये अक्सर करते हैं किसी से नहीं कंपेर करते हैं, अपने यकीनों को जिगर करते हैं, हो जायें आप बुलंद, लगे नहीं वो नज़र करते हैं,

उस्ताद शबाना!

ये शबाना है , हिम्मत , लगन को दुनिया में रहने का बहाना है , मुश्किल है फ़िर भी मुस्कराना है , कल की बात बेमानी है , आज़ को आज़ ही सुलझाना है , और तरीके अपने , (मक्का मस्ज़िद, हैदराबाद में शबाना अन्य महिलाओं को ऐरोबिक्स करा रही हैं)‌ ( दुसरी क्लास में शबाना स्कूल छोड़ दी क्योंकि उऩ्हें टीचर से इज़्ज़त नहीं मिली ) दुनिया तो हर तरीका आज़मायेगी , (बुरके की परिभाषाओं को बदलते हुए शबाना) कभी फ़ुसलायेगी , कभी ताकत आज़मायेगी , कभी नाउम्मीदी के सपने दिखायेगी , पर ये दाल यहां नहीं गलेगी , कुछ करना है , नया ही सही , ड़रने कि लिये पूरी जिंदगी पड़ी है , (13-14 साल की उम्र में शबाना अपने को 16 मानकर / जानकर प्ले फ़ॉर पीस ( www.playforpeace.org ) कि सदस्य बनीं और पुराने हैदराबाद की संकरी गलियों में बच्चों को मुस्कराने , हँसाने लगी !) गुड़मॉर्निंग , फ़ोलो मी जैसे कुछ लफ़्ज़ बोल इंग्लिश मीड़ियम स्कुल में भी जानी जाने लगी , ड़र तो था , पर अपने से मुहब्बत कैसे छोड़ दें , हर एक मकाम पर आकर भी , “ बस अब एक और सपना है " सोच ने रोक...

इमरोज़

बड़े कायदे से एक कायदा तोड़ दिया, दुनिया को सरेआम गुमराह छोड़ दिया! कहें वो जो कहते हैं, यही होता आया है, समाज़ सदियों से यूँ ही सोता आया है! मर्ज़ी थी सो हमने कर दिया मन-माफ़िक पहले भी ये इल्ज़ाम अपने सर आया है! दुनिया हमारे कदमों में कभी भी नहीं थी, कुछ अपनों से आज़ ये पैगाम आया है!  बड़ी बेमुरव्वत निकली मोहब्बत अपनों की,  कहाँ  दुआओं में आज अपना नाम आया है? मुश्किलों में कब हमने अपना साथ छोड़ा ये अपनापन ही अपने बड़े काम आया है, कोई भी अकेला नहीं है इस सफ़र में, फ़िर क्यों रास्तों पर इल्ज़ाम आया है?  अरसे से एक दुआ थी जो कबूल हो गयी,  क्यों किसी ज़ुबान पर काफ़िर नाम आया है!  इल्ज़ाम लगते हैं बहक गये हैं हम बेखुदी में युँ तो आज ही हाथों मे अपने जाम आया है! (इमरोज़ ने सितम्बर २००० में‌ हैदराबाद ऑल्ड़ सिटी में एक अंतराष्ट्ईय संस्था प्ले फ़ॉर पीस में एक वॉल्टीयर का काम शुरु किया था, 16 साल की उमर में, आज वो अमेरिका में प्ले फ़ॉर पीस की ऑपरेशन मैनेजर हैं और कोस्टारिका की UN पीस युनिवर्सिटी से Masters कर रही हैं!)