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शुन्य का अधूरापन

  चाहना,  न होना,  बन जाना सिफ़र  ये मकाम हो, या सफ़र ? असर न हो, जिक्र न हो, यूँ हो जाए कि कोई, कबर न हो! और इस की कोई  खबर न हो!!

रास्ते!!

  यूं गुजर रहे है की जैसे रास्ता हैं, कुछ होना नहीं, कुछ बनना नहीं, साथ सब के हैं, किसी के हाथ नहीं, अगर मुश्किल हो  तो वो रास्ता नहीं, रास्ते किसी के रास्ते नहीं आते, और कभी भटकाते नहीं हैं! रास्ते कहीं जाते नहीं हैं, कहीं पहुंचाते नहीं हैं, रास्ते बस शून्य हैं, अपने आप में कुछ नहीं, पर कोई साथ ले, तो सौ-हजार हैं, जरूरी हमसफ़र है, आपसी व्यवहार हैं! अपने कदमों से पूछिए! क्या वो इस दोस्ती तैयार हैं? मंजिलों से घिरे हुए हैं, फिर भी रास्ते आज़ाद हैं, जो ये समझ जाए वो मुसाफ़िर है, सफ़र ही उसका आख़िर है, समझ पाएं तो, जिंदगी भी एक रास्ता है, आने और जाने के बीच से गुजरते, रुकने का सोच रहे हैं? मूरख, आप जागते भी सो रहे हैं!!

कौन पहचान!

एक छत चार दीवार घर  गली शहर सुबह शाम चार पहर वास्ते किसके, किससे, साथ, रिश्ते दोस्ती आसमान, जमीन, पेड़ पौधे रंग हजार, ऊंची उड़ान, गले मिलती हवा  धूप सहलाती वास्ते किसके किससे! साथ रिश्ते दोस्ती ये धरा आपकी क्या है आपकी पहचान?

कुछ होना है!

"कुछ होना है" खेल है, दुनिया का! आप खिलौना हैं! सच तमाम है,  झूठ बोलते, उसके सामने आप बौना हैं! आप कम है, क्योंकि कोई ज्यादा है, खेल घिनौना है! कंधे किसी के सीढ़ी किसी को कामयाबी भी बोझ ढोना है! तराज़ू किस के, नाप किसका बाज़ार बड़ा है, आप नमूना हैं! रंग फीका है, ऊंचाई टीका है, वज़न ज्यादा कम मुश्किल होना है! "मैं" पहचान, पीड़ा, अभिमान, बड़ी तस्वीर, आप एक कोना हैं!

पहचानें!!

अपनी नजर से खुद को देख पाएं कभी ऐसा एक आइना बना पाएं! शोर बहुत है मेरी नाप तौल का , कोई तराज़ू मेरा वज़न समझ पाए? छोटा बड़ा अच्छा बुरा कम जादा, वो सांचा कहां जिसमें समा जाएं? नहीं उतरना किसी उम्मीद को खरा! जंजीरें हैं सब गर आप समझ पाएं! मुबारकें सारी, रास्ता तय करती हैं, 'न!' छोड़! चल अपने रास्ते जाएं!! वही करना है जो पक्का है, तय है? काहे न फिर बात ख़त्म कर पाएं? अलग नहीं कोई किसी से कभी भी, ज़रा सी बात जो ज़रा समझ पाएं!!

आसान मुश्किल!

ये जो मेरे जमीन आसमान हैं, ये ही मेरे सपनों के सामान हैं! मुझे कहां पंख लगते हैं, उड़ने? वहीं हूं जहां मेरे अरमान हैं! वो ढूंढे जमीं जो आसमान हैं! पैर कहते हैं पुरानी पहचान है!! फिक्र कहां, कब कहां पहुंचेंगे? चल दिए, वही अपना अंजाम है! खोए हैं, अपनी ही तलाश में, कौन कहता है काम आसान है? बनावट, दिखावट, सजावट सब, महंगा सामान ओ सस्ती दुकान है! अक्स है वो, सब जो तराशते हैं! कब समझेंगे बदलता मकान है!

पहचान - एक गुलामी

बचपन से सिखाते हैं, मुझे "मैं" बनाते हैं, अलग करके सब से रिश्ते दिखाते हैं, जज़्बात जगाते हैं, प्यार, देखभाल, मदद हरहाल, इज़्ज़त, और फिर इन सब को सही-गलत, अपने-पराये छोटे-बड़े के दायरे में बंद कर नैतिकता बनाते हैं, चेतना बना कर सरहदों के कैदी बनाते हैं, इस तरह आज़ाद हो हम दुनिया में आते हैं!

पहचान - एक ज़ुबान

ज़िंदगी नाम है, या काम? संज्ञा, सर्वनाम? क्रिया, विशेषण? या ये सब तमाम? क्रिया बिन क्या नाम? नाम बिन कोई काम? काम कोई विशेष हो जो बन जाए सर्वनाम? या सर्वनाम काम है? जैसे उपनाम है, जन्म दर जन्म, आपको जकड़े हुए, जात, धर्म विशेषण, क्रिया एक शोषण? कुरीति, कुपोषण? और उन सबका क्या, जो बेनाम हैं, उनके लाखों काम हैं, न उनकी कोई संज्ञा, न कोई सर्वनाम है! भाषा से ही, भाषा में भी उनका काम तमाम है!

पहचान से - अधूरे

कोई भी एक पहचान, हमें अधूरा करती है, हवा, पानी, राख, मिट्टी, लाखों ख़्वाब, रंग जाने पहचाने, रिश्ते, माने न माने वो सब जो कभी हाथ थामे, कभी एहसास बन, कभी प्यास बन, हमारे रास्तों के हमसफ़र हैं, बिन उनके, हम कम हैं, हम एक हैं नहीं, पूरे अधूरे हैं, अधूरे पूरे हैं!

पहचान एक - मुसीबत

हर मुसीबत आईना है, खुद को नज़र आने को, अपने अंधेरों से रूबरू होने को अपनी रोशनी के परे जाने को, अपने सच के नकाबों के परे, दुनिया के रिवाजों से घिरे पर्दे हटाने का, काम, आसान नहीं है, अपने से पहचान, करना है, आइनों से मुलाकात, दुनिया के तमाम, 'चाहिए'; 'ऐसा ही', 'लेकिन'; 'पर-मगर' शक के परे जाकर, अपने सामने आकर!

रोज़ होते कम!

कितने टूटे हैं हम, कितनी दरारें हैं, रिस रहे हैं  हज़ार जगहों से, लाख वजहों से, कितने कम पड़ते हैं, अपना कहकर, अपनों से लड़ते हैं, छीन लेने को,  उनका यक़ीन, उनका प्यार ज़ख्मों का कारोबार, हिंसा का सिक्का, इतना डर? कैसे इतने हम खर्च हो जाते हैं? खुद को भी बचा नहीं पाते हैं? दुनिया की बंदर बांट में, फिट होने को, बहाना! खुद को तराशते हैं।  सच कुछ और! ख़ुद को ही काटते, छांटते, नापते, हर मोड़ कुछ और कम हो जाते हैं, और फिर  ख़ुद को ही ढूंढते हैं, ज़हन में दरबदर घूमते हैं, न ख़त्म होने वाली तलाश, हमारी लाश! कितने हम बिखरे पड़े हैं, टुकड़ों में,  हर जगह, घर में, दुनिया में, अकेले में, काम पर, दोस्तों के साथ, हर जगह,  अधूरे बड़े हैं, हर लम्हा पूरा होने, खर्च होते हैं, चमक चुनते दुनिया कि, अपने अंधेरों को शर्माते हैं, अपने सामने, खुल कर कब आते हैं? नाम कमाने को अपना, ख़र्च हुए जाते हैं, बड़े सस्ते  खुद को निपटाते हैं! भीड़ में एक नाम? जय श्री!!!

बहुरूपी सच!

सुनने की सर्दियाँ!

हमारे अंदर जो बेशकीमती है, उसे अछूता रहना है हमारी सोच से जो हमारे होने को कम करती है| उम्दा होने की जो हमारी लड़ाई है, उससे नहीं बनी नन्हे फरिश्ते सी मनचाही हमारी बानी| जो विचलित करती है फिर अपने पनपने को उस सब के साथ जो जरूरी है| खुद की वो बात जिससे हमे नफ़रत है, और हमें नहीं पता कि वो हममें कहाँ है पर जो तरीकों में नज़र आए, उसको समझाने की जरूरत नहीं| हर किसी के भीतर एक असीम आनंद की किलकारी है जन्म लेने को तैयार| और यहां बड़बड़ाती रात में मुझे सुनाई देती है, अखरोट पेड़ की बच्चे के पालने ऊपर लहलाहट, अपने अंधेरी शाखाओं से हवा में और अब बरसात आकर मेरी खिड़की पर दस्तख़ देती है और कहीं और तारों और हवा की इस ठंडी रात में, वो पहली बुदबुदाहट है, उन छुपी और नज़र न आने वाली वसंत कि अंगड़ाई की, ठहरी गर्मी की हवा की वजह से, हर एक अभी तक अकल्पित, सर उठाती हुई!!

अपनापन!

हम  उन्हीं आवाज़ों से बात करते हैं , जिन्हें हम खुद सुन सकते हैं , और काया बोलती है , और वो बात करती है , सिर्फ़ , उस देह - ए - दुनिया से , जो उसकी पकड़ में है। और वो अपने आप में एक जहां हो जाती है , गौर करके , कि उसका सरोकार क्या है और ये सीखती है , कि उसे क्या होना है , और क्या लाज़मी है! (डेविड व्हाईट की द  विंटर ऑफ़ लिसनिंग से) From  The Winter of Listening by David Whyte in  The House of Belonging

यूँ होना!

मुझे खोना नहीं आता 'मैं' हूँ पर होना नहीं आता, चादर बहुत हैं सोने को, ओ मुझे बिछौना नहीं आता गम हमको भी हैं तमाम, उनके कंधे रोना नहीं आता अकेले भी अच्छे हैं बहुत, गोया हमें खोना नहीं आता!! उनकी एक ही शिकायत बस, जहां हैं वहां होना नहीं आता! आख़िर भूल जाते हैं सब, सबको, हमें किसी का होना नहीं आता! फर्क पड़ता है, क्या फर्क पड़ता है? क्यों हमें हक़ीकत होना नहीं आता? खुश होंगे सब इसलिए कह दें? हमें बातों को चाशनी डुबोना नहीं आता

अंधे आसमाँ 5

खेल - अब देखिए! मेरा अपने से बेजोड़ मेल , अपनी हिम्मत से दो - दो हाथ , डर के साथ , डर से बात कौन बड़ा? करने के डर और न करने का , आमने सामने खड़े हैं! ज़िंदगी के सारे सच टूट कर , पैरों तले पड़े हैं!! हारा कौन? जीता किससे? होंगे मशहूर मेरे किस्से!! क्या मुश्किल है? अपनेआप से हारना? या अपनेआप को मारना? फर्क है कुछ? कहीं? किसको? मैं जी रहा हूँ! किसके लिए? कोई कदम मेरे साथ? कोई पीठ पे हाथ? किसी की नज़र मुझ पर? या मैं बेनज़र हूँ? बेअसर? तमाम , हाथ , पैर , नाक , कान , मुँह की भीड़ में एक , अनेक? रोज़ का किस्सा? भीड़ का हिस्सा? मुझे दिखता है ….! मैं अब कहाँ हूँ! आप भी अब देखिए!