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ये क्या होरया?

सड़क पर गड्ढ़ा हो रेया गणपति बप्पा मोरया काला चश्मा पे डांस हो रेया गणपति बप्पा मोरया डंडे से चन्दा इकट्ठा हो रेया, गणपति बप्पा मोरया ईगो जैसा बड़ा मूर्ति हो रेया गणपति बप्पा मोरया सब शेप साइज़ में बिक्री हो रेया घर बैठे सार्वजनिक गणपति बप्पा मोरया मिटटी प्लास्टिक हो रेया गणपति बप्पा मोरया भक्ति में भी चूहा दौड़ हो रेया गणपति बप्पा मोरया नास्तिक होगा जो भूखा सो रेया, गणपति बप्पा मोरया! मूरख कहे कण में भगवन, यकीन कोई न हो रिया ? गणपति बप्पा मोरया! भक्ति कहें एक रिश्ता है,  इतना तमाशा क्यों हो रिया? गणपति बाप्पा मोरया!

चाहिए! चाहिए! चाहिए!

पंसारी की दुकान है उपर आसमान में, हाथ उठे हैं और सबको सामान चाहिए! काम फ़कीरी का ज़रा आसान चाहिए क्यों दुआ माँगें के सुख-सामान चाहिए! क्यों लाउड़स्पीकर भर भजन, इबादत है? नेमत बरस रही है आपको कान चाहिये! लॉटरी वाले का नाम भगवान चाहिए, मन्नत पूरी होना ज़रा आसान चाहिए! क्यों शोर मंदिर-मस्जिद-गिरजे में इतना है, काफ़ी नहीं के सबको इंसान होना चाहिए? बस एक फ़िक्र के दोनों हाथों में लड़्ड़ू हो, भगवान चाहिए या सिर्फ़ भगवान...! चाहिए? हाथ खड़े कर रख्खे हैं मंदिर के भगवान ने, आज़ादी के लिये शायद इंसान चाहिए! सुना, सब कुछ संभव है इंसान चाहे तो,  बस गुंड़े, दलाल, ओ लाठी बंदूक चाहिए!  

बेढब मुमकिनियत!

पेट भर के बात की उम्मीद क्या करें साथ उम्र भर को दो लम्हा कान चाहिए! जब देखो लगे है सब गधामजूरी में कहते है ज़िन्दगी में आराम चाहिए! दिन कैसा भी गुजरे हर किसी का जी चाहे सुहानी हर शाम चाहये!  क्यों किसी से बैर चाहिए, सबको अपनी खैर चाहिए इतनी जलदी नउम्मीदी, कुछ होने देर-सबेर चाहिए ज़मीं, ज़मीं पर है, और उपर आसमान किसको खबरें पड़कर परेशान चाहिए? कौन दूर है हमसे कौन आ गया है पास ज़िदगी ज़ीना है या इसका हिसाब चाहिये हाँ नही तो, हम नहीं होते यूँ उदास, आईने में नज़र अपने पास चाहिए! जेब में अपनी भगवान चाहिए, उम्मीदों को मुफ़्त दुकान चाहिए, मन हुआ तो सामने हाज़िर हो, किस्मत सबको अलादीन चाहिए! काम चाहिए, नाम और आराम भी, अपने ही पोस्टर लगे बाज़ार चाहिए!

जय श्री राम!

घर में सबको भगवान चाहिए, मंदिर का रास्ता आसान चाहिए, पैसे से मिलते है दर्शन, फिर किसको लंबी लाइन चाहिए! लोग मक्खी की तरह फिरते हैं, पहले घर को सामान चाहिए, कौन तपस्या करे, और तीर्थ पैदल करे, जन्नत के लिए अब विमान चाहिए! सीधी ऊँगली से नहीं मिलता, तरीका सबको शैतान चाहिए। कोई और करे तो बुरी बात है, किसको अपनी तरफ ध्यान चाहिए! टीवी सीरियल बन रही है ज़िन्दगी, सुनने को दिल की बातें 2 एक्सट्रा कान चाहिए, हर गली में मंदिर, हर पूजा पंडाल, जहाँ मर्जी कचरा, हर दीवार मूत्रपीकपान, बस उतना आसान भगवान चाहिए! किसने देखा है कितनी मुश्किल आसान? हो रहा है बस इतना सबको भान चाहिए! जो समझ सकते हैं सच्चाई वो बच्चे हैं, उनके दिमाग में सेंध लगानी है, अब तक मान्यता की बातें होती थीं, अब भगवान को विज्ञान चाहिए!! भगवान की क्या औकात हाथी को श्रीगणेश करें, प्लास्टिक सर्जन कोई उस टाईम चाहिए! प्रभु की क्या जुर्रत की जमीन आसमान करें, इंजीनियर का बनाया पुष्पक विमान चाहिए! कुछ नया नहीं है दुनिया में, हमेशा होता आया है, अंधभक्ति को मूरख इंसान चाहिए! जय श्री राम......देव, आसा, रवि...

मर्द -औरत

कुछ लोग दुनिया के औरत होते हैं ज्यादातर तो सिर्फ बेगैरत होते हैं! देवीओं के भजन और देवीओं का ही भोजन, न सज्जन है कोई ढंग का, न ढंग का साजन! कितने बेअसर अब सारे मर्द होते हैं, दवा हो नहीं सकते फ़क्त दर्द होते हैं! छाप मर्द की है और निशान औरत के, बड़े फुजुल है कायदे तमाम शोहरत के दबंग होना मर्दानगी और छिछोरापन तहज़ीब है, क्या समझें अपनी कुछ रवायतें फ़िर अज़ीब हैं! कौन कहता है मर्द को दर्द नहीं होते, बात अंदर की है, मामले युँ सर्द नहीं‌ होते, युँ कि, जब हम इज़हार करते हैं, क्या मज़ाल किसी की, हम इंकार नहीं सुनते! स्त्री धन है, बहुत मर्दॊं के लिये, बदन है, फिर भी क्यों मां बनती है, बढ़ा प्रश्न है?

खुली दुकान है!

छलकते लम्हे वक्त को मुँह चिड़ाते हैं, घड़ीयों के चक्कर मे कहां कभी आते हैं! कांटे घड़ी के क्या समझें वक्त की नज़ाकत, युँ चल रहे हैं धुन में जैसे सदियॊं की कवायत! भगवान को भागवान करते हैं युँ जीने का सामान करते हैं अपने यकीन से जुदा हैं लोग इबादत को दुकान करते हैं! तन्हाई की दुकानें कितनी, खरीददार कोई नहीं, जज़बातों के बाजार में, अपना यार कोई नहीं ! ससुरे सच सारे, और हम बेचारे, लगाये ताक बैठे हैं देखें अब बारी आयी है सो,अब तक तो पाक बैठे हैं!  हालात सारे बेहया ससुर बने बैठे हैं हाल हमारे नयी दुल्हन बने बैठे हैं! बातॊं-बातॊं में आ गये आसमान तक, युँ ही कुछ देर और कुछ आसान कर! दुआ है कि दुनिया थोड़ी काली हो, रंग कोई भी, गाली न हो सच को इश्तेहार नहीं लगता, और रंग को कोई माली न हो! रंग बिखरे हैं कितने मुस्कानों में, जो रह जाते हैं अक्सर छुप कर बहानॊं में, चलो लटका दें कुछ मस्तियाँ दुकानों पे,   नज़र कहाँ जायेगी आसमानों पर!  वक़्त खोटा है इसके झांसे में न फ़सिये, दिन गिनना छोड़िये, जी भर के हंसिये! मैं और मेरी आवारगी, हालात की कारागिरी, अजनबी मौके हर मो...