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2016

सच्चाई नहीं बदली और साल बदल गया, चन्द लम्हों को रात का माहौल बदल गया, बदला ऐसा के शोर बड़ गया, शायद दाढियों में तिनके का जोर है, और हम से ये उम्मीद कि ज़रा जोर मुस्करायें, तहज़ीबें कवायत है कदम मिलायें, अच्छे दिन आयेंगे, एइसे गाने गायें, चौंड़ा सीना बन जायें, बकरी को गाय बनायें, मज़हब के नाम सब गुड़-गोबर बन जायें, सारी बहस ख़त्म हो जाएँ, लाजमी है सब एक राय हो जाएँ, मंदिर वहीँ बनाएं अलग राय रखने वालों को बजरंगी बन जाएँ या तो चुप रहें या मुँह काला करवाएं, ज़रा भी शराफ़त बची है, तो घर वापस आयें, छोड़िये ये बातें पुरानी हैं, तारीख बदल रही है कई तरीकों से, दीवारों पर, किताबों में, शायद सब बदल जाए, भेड़ों की संपन्नता देख, आप भी भेड़ बन जायें कल सुबह आप उठें, तो खबर बतायें, सब सकुशल, सब बराबर, न किसी की जात, न ऊंच-नीच, न गरीब-अमीर न मजदुर न मालिक मुबारक हो, हमें भी जरूर बताएं, जब आपका साल मुबारक हो जाये!

देर-अंधेर

सुबह के फूल, शाम की धुल चमचमाती गाड़ियां नयी जैसी, बहुत सारे पानी की ऐसी की तैसी, गेंदे से सुसज्जित, पूजा युक्त गाडियाँ भक्तों के हाथों, सिग्नल तोडती हुई, "भगवान मालिक है" अपनी ही दुनिया है, उसमे 'नो एंट्री' कैसी? कहते है आज, बुरे पर अच्छे की जीत है! 'आज' पर इतना संगीन इलज़ाम तिलमिलाते 'आज' को दिलासा, यही रीत है, अब राम की लीला होगी, सीता की कौन सोचे, "एक चादर मैली सी" एक चाय की दुकान पर, टोपी लगाये, कूच हाल्फ़-पैंट टोपी लगाये, और चुस्की लेते, गाँधी(वाद) को तो पहले ही निपटा दिया अब कौन सा सच बाकी है, गुजरात गवाह है, आज सच बहुत खाकी है, टक-टक की लय पर थिरकते पाँव, चमकती रोशिनी, दुनिया रोशन, सबको एहसास है, अँधेरा है चिराग तले, वो जगह बकवास है और सुबह उठ कर देखता हूँ सड़कों पर कचरे का ढेर है (ईद के दूसरे दिन भी हैदराबाद में यही नज़ारा था, हम सब एक हैं!) सूअर हँस हँस कर कह रहे है शुक्र है मालिक! आज देर कहाँ, सिर्फ अंधेर है, दशहरा-दिवाली वगैरा आप को मुबारक हो! (नवरात्री के शो...