सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

healing लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चलो खेलते हैं!

चलो खेलते हैं, उन सब बातों से, मुलाकातों से, जज्बातों से, हालातों से, सौगातों से, जो बोझ बनती हैं, खेलते हैं, मर्यादा से, चरित्र से, परंपरा, मान्यता, जो जंजीर बनती हैं, चलो खेलते हैं, जंजीरों से, जो हमें कम करती हैं, किसी के रंग से, एक तय ढंग से, किसी के कद से, उम्र की हद से, जात, धरम, पद से, पैसे की मद से, चलो खेलते हैं उन बच्चों से, सब बच्चों से, जो सताए हुए हैं, डराए हुए हैं, भरमाए हुए हैं, तालीम के मारे हैं, पैसे बहुत सारे हैं, प्यार के बेचारे हैं, सदमे बहुत सारे हैं, चलो खेलते हैं, खुद से, अपने आईनों से, अपने मायनों से, उछाल देते हैं सब हवा में, देखें क्या हाथ लगता है? क्या वैसा का वैसा ओ क्या बदलता है? आपको चलता है? (पूना में हाल में हुए अनुभव आधारित शिक्षा की सालाना कॉन्फ्रेंस में प्ले फॉर पीस यानी खेल से मेल संस्था और प्रक्रिया के अभ्यासकर्ता स्वाति भट्ट, सिंधुजा और आज्ञातमित्र के सत्र का विषय था "खेल - जरिया अविरोध का" । इस सत्र का मकसद ये समझना था की कैसे खेल (प्ले फॉर पीस) के जरिए हम शोषण, हिंसा और सदमे से मुकाबला करने का सामर्थ बना सकते हैं। ) www.playforpeace.org...

खेल से मेल – खेल बेमेल!

एक और शनिवार, ख़ास फिर एक बार, बार-बार की खलबलाहट से, हँसी खुशी की बुदबुदाहट से, साथ जाकर, हाथों–हाथ पाकर गुजरे हुओं की समझ पाकर, स्वस्थ होते, दुरुस्त होते ये जरूरी है कि, अनहोनी के सदमों की तमाम परतें, पीढ़ी दर पीढ़ी रिसते ज़ख्म में बंधे हुए रिश्ते, और ऊपर से सियासती बदी, बोझ बन छोटे कंधों को, कम बेदम करती है.. आज फिर हम साथ हुए, खेल से मज़ाहमत करने, साथ की सांसे भरने, उम्मीद सांझा हुईं, दर्द को मिटाने नहीं, दूर करने, साथ चलने जिंदगी का जश्न, फैलते दायरे दर्द याद बने और हम सब आबाद! खेल खेल में!!   ( श्रीलंका में हम सिंधुजा के साथ पिछले कुछ सालों से प्ले फॉर पीस का काम कर रहे हैं. खासतौर से पिछले 2 सालों से. हाल ही में ही तूफानी बरसात से श्रीलंका में काफी बर्बादी फैलाई। जानमाल की, जैसा कि दुनिया में हमेशा बोला जाता है। पर ऐसी आकस्मिक हुई विपदाओं से पैदा हुई दिमागी परेशानी अक्सर जानमाल का ध्यान रखने में नजरअंदाज हो जाती हैं। ऐसे में सिंधुजा और उनके सहभागी तारका ने एक रिलीफ कैंप में जाकर बच्चों के साथ हर हफ्ते "खेल से मेल" के "शांति का अभ्यास सत्र" लेना शुरू किए. सिंधु...

कश्मीर, कश्मीरियत और खामोश सवाल!

कश्मीर, मुस्कराते लोग, हँसते बच्चे, बर्फीले पहाड़, पाक-साफ़ पानी इन्तहां खूबसूरत! कश्मीरियत, जज़्बा         इरादा,         हाथ में हाथ, मुश्किल में साथ, दर्द में डूबे हालात, मुस्कराते हमसे बात, एक सवाल सिर्फ, "आप ही बताएं..." हम क्या बताएं?     

क्या खेल खेलें कश्मीर के बच्चे?

आज बहुत मजबूर हूँ, कश्मीर से बहुत दूर हूँ, जैसे पेड़ खजूर हूँ, याद आ रहे हैं वो दिन, वो लोग जो इंसान थे, हमारी तरह, तुम्हारी तरह एक उम्दा मेज़बान की तरह, साथ हंसते थे, हम परेशान न हो, इसके लिए परेशां रहते थे, जब उनके साथ "खेल से मेल" किया, तो सब वैसे ही हँसे जोर जोर से, जैसे लोग बनारस में हँसे थे, या कंदमाल में, दिल्ली में, पुणे में, जुबा में, येंगॉन में पर उसके बाद जो बात हुई, तब उनके दर्द से मुलाक़ात हुई, "हमारा बचपन अँधेरे को बली था" अब हम अपने बच्चों को हंसाएंगे, वो हमारे शुक्रगुजार हुए, और हम, अपनी नज़रों में ज़रा कम गुनाहगार हुए, कश्मीर भारत को खूबसूरत है, और सारे देशभक्त, उसको कोठे पर बिठाना चाहते हैं, एक जगह है सबके लिए, जहां से डॉलर्स आते हैं, पाउंड, यूरो, और रूपये भी, कौन छोड़ता है ऐसे माल को, हर साल जो नयी हो जाती है, वर्जिन तैयार नथ उतरवाने को, कौन देखता हैं कि वहां इंसान हैं, उनके दिल हैं, उनकी जान है, उनके बच्चे हैं जो सरकार की गोली कुर्बान हैं! सफर ज़ारी था, आने जाने में, कश्मीरी दोस्त हमको लगे जगहों के बारे बताने...

इश्क सलामत. . . !

चलो इश्क लड़ाएं ,  अच्छा लड़ाई क्यों,  इश्क रहने दो बस  तुम हो, मैं हूँ, साथ है, कुछ बात है तुम अब भी शर्मा जाती हो, मैं अब भी घबरा जाता हूँ फिर क्यों हम अपनी संवेदना से खेल रहें हैं मैं अब भी कम सुनता हूँ, तुम अब भी देर से उठती हो अब भी तुमारी बिरयानी मेरी चाय है, मुझे अब भी सही करवट लेना नहीं आता तुमको भी कहाँ ठीक से सोना आता मैं नहीं होता तो अब भी तुम MISS करती हो मौका मिल जाए तो, मैं भी पास आकर .... खैर छोड़ो तुम अब भी मुझे मर्द समझती हो मैं अब भी दर्द नहीं समझता अगर कुछ नहीं बदला  तो दर्द क्या है, कौन सी चोट है शायद हमारे देखने में खोट है या कोई पुरानी  चोट है और हम मलहम नहीं बन पा रहे कौन से घाव है जो नज़र नहीं आ रहे अरे . . .  कुछ करवटें हैं कुछ सलवटें बनी नहीं कितनी रातें है अपनी जो बिन गुजरे ही रह गयीं सोचता हूँ. . . कैसे हम बीमार हैं कि आपको बुखार है किसका हो इलाज, किसको ये अजार है सोचें तो. . .  कैसी ये अपने बीच ज़ख्मों कि दीवार है इश्क तुमसे है गर तो क्यों जख्मों से प्य...