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समंदर अहंकार!

साहिल डूब रहे हैं अपने ही समंदर से, और सर चढ़े समंदर को शऊर कहां? बिखर कर खो जाओगे समंदर, इल्म है? बूंद से सीखो ऐसी तुमको नज़र कहां? भूल कर शुरुवात, अंत को इतराते हैं? मील के पत्थर हो तुम, मुसाफिर कहां? पहाड़ों को जज़्ब करके अट्टहास क्यों? वही बन गए जिसको तुम गिराते हो? एक ही रंग में भिगो दिया सबको? मुरख! अपनी ही पहचान गंवाते हो? वो बाबरी थी ओ तुम भी बावरे निकले? कट्टरता कहते थे (जिसको) वही दिखाते हो

त्रिगुण

अनेकता में एकता है?  कौन इतनी फेंकता है?  ...नाम बताओ तो सब सरनेम पूछते हैं! सवर्ण कहाँ संविधान है?  लाखों पांव के छाले पूछते हैं? आप बूझते हैं? भारतीय  साथ दीजिए,  प्यार कीजिए, इज़हार कीजिए!  कहिए क्या सवाल हैं? भलेमानुस घर छोड़ कर आए हैं,  खाली हाथ घर वापस  ये देश के पराए हैं!  मजदूर  बढने की उमर है, पर किधर जाएं?  खाने, खेलने, सोने, बच्चे मालिक ने निकाल दिआ  सरकार ने टाल दिआ,  पुलिस की लाठी, गाली  ताली कोई परेशानी नहीं,  टीवी भगवान है,  बीबी पकवान है!  भक्त मर्द कितने हमदर्द हैं,  कितने साथ आए हैं,  कितने छुट गए, ओझल!

इतिहास्य

विकास का इतिहास है उसकी बुनियाद, अनगिनत इंसानों की लाश है दफनाए हुए, सच कहने को "काश" है नाम – सभ्यता पता – आधुनिकता उम्र – सदियाँ बीत गयीं इतिहास गुलाम है चंद हाथों में उसकी लगाम है जो बुनियाद बन गए उनकी प्राथमिकता(F.I.R.)दर्ज नहीं, जो कमज़ोर थे, उनकी बात आज़ न करें तो हर्ज नहीं तलवार सर कलम करती है समझदार को इशारा काफी सच्चाई हमेशा हुकूमत को सर करती है, आप को अपने इतिहास पर, परंपरा पर गर्व है जाहिर है आपकी जिंदगी पर्व है, आप को क्या इल्म है लालच, वहशियत, पागलपन, जुल्म, जब इतिहास के पन्नों पर चड़ते हैं तो समृद्धि, वीरता, दूरदर्शिता, न्याय कहलाते हैं, आपका दिल बहलाते हैं इतिहास गवाह है, कितनी भी परंपरा की वाह-वाह है, हम आज भी वही इंसान है लालच, जुल्म, वहशत, अब भी हमारी शान है, मुबारक हो ! भ्रष्ट समाज की सूचि में अपना ऊँचा स्थान है!