साहिल डूब रहे हैं अपने ही समंदर से, और सर चढ़े समंदर को शऊर कहां? बिखर कर खो जाओगे समंदर, इल्म है? बूंद से सीखो ऐसी तुमको नज़र कहां? भूल कर शुरुवात, अंत को इतराते हैं? मील के पत्थर हो तुम, मुसाफिर कहां? पहाड़ों को जज़्ब करके अट्टहास क्यों? वही बन गए जिसको तुम गिराते हो? एक ही रंग में भिगो दिया सबको? मुरख! अपनी ही पहचान गंवाते हो? वो बाबरी थी ओ तुम भी बावरे निकले? कट्टरता कहते थे (जिसको) वही दिखाते हो
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।