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दिशा और दशा!

क्या इस देश की दशा हो गई है क्या इस देश की दिशा हो गई है? ताकत तो हमेशा से ही नशा थी, अब अवाम की सज़ा हो गई है! सोचो मत, बोलो मत, देखो मत, देशप्रेम की ये इल्तज़ा हो गई है! खामोशियाँ बहरा न कर दे सबको, कुछ ऐसी आजकल हवा हो गई है! बहका दो नफ़रत से या चुप कर दो, नौजवानी जैसे कोई सज़ा हो गई है! इस दौर कोई भी मासूम कैसे हो? मुख़ालिफ़त ही गुनाह हो गई है! बस? अपनी अपनी सोच के सब क़ाबिल, राय मेरी, सच की जगह हो गई है!

अब क्या?

दर्द है बहुत पर अपना ही तो है, टूट गया है वो पर सपना ही तो है! कड़वाहट फैल गयी है हर ओर, लाज़मी उसका चखना ही तो है? अपना नही पराया लगता है अब, क्या गिला मुल्क अपना ही तो है? हाथ खड़े कर दें और बैठ जाएं? उम्मीद को कहीं रखना भी तो है? नफरत से भी इतनी मोहब्बत, कैसे? क्यों दिल किसी का दुखना भी तो है? और ये दौर भी गुज़र जाएगा एक दिन, अभी फ़ूल गुलशन के महकना भी तो है! समझ नहीं पाए हक़ीकत, ये इल्जाम, फंदा तैयार है बस लटकना ही तो है! उम्मीद के बनजारे हैं और कहाँ-कहाँ जाएंगे? उनकी गली एक दिन फिर भटकना भी तो है?