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ये दास्तां! ब्लॉइंग इन द विंड!

कितने रास्तों पर हम चलें जब कहेंगे ,  हां ! हम हैं इंसान कितनी सरहदों का सामना हम करें जब कहेंगे ,  बस ! अब और नहीं कितनी जंग लड़ें और मरें , जब कहेंगे ,  नहीं ! एक भी और नहीं ! ये दास्तां हवा में है बयां , हवा में है ये दास्तां बयां , कौन से सच सर चढ़े हैं सदीओं से आखिर कब जमीं से मिलेंगे ? कब तक जुल्म में लाखों घुटते रहेंगे  कब कहेंगे हम हैं आज़ाद ? किस किस से ओ कब तक हम मुंह फेरते रहेंगे ,  जैसे कुछ हुआ ही नहीं ? ये दास्तां हवा में है बयां ,  हवा में है ये दास्तां बयां , कितनी बार कोई नज़र उठाते रहें के आ जाए नज़र आसमाँ कितने आंसूं बरसे जब कभी कानों पर ,  जूं रेंग जाए कितनी मौतें और खबरों के बाद ,  " बस ! बहुत हुआ " कह पाएं ? ये दास्तां हवा में है बयां ,  हवा में है ये दास्तां बयां! कौन से आईनों में हम देखें के तस्वीर पुरी जान पाएं? कितने बचपन बच्चों के मजदूरी से ...

रास्ते अनकहे!

रास्ते, चलते हुए, यहां-वहां जहां-तहां हर ओर से निकलते हुए, हर लम्हा, एक एक पल हमसफ़र बनने तैयार, आप कहाँ अकेले हैं? सफ़र में? "ट्रस्ट द प्रोसेस" रास्ते किसी को रोकते नहीं, कभी टोकते नहीं, 'नज़र नहीं आते?' आप कदम क्यों नहीं उठाते, फिर कहिए, क्यों? मेरे पैरों के नीचे नहीं आते? क्यों अपने शक आज़माते हैं? शक नए रास्तों से घबराते हैं! अपने कदमों को अपना यकीन कीजे, आसमाँ-अरमान को जमीन कीजे, मुमकिन? .....सफ़र में Swati साथ☺️

अपने से गुमशुदा!

अपने ही रास्ते अब तय नहीं कर पाते, अपने ही सपनों में अब हम नहीं आते, अजनबी हो रहे हैं खुद से हर रोज़, जानते हैं अच्छे से पर मिलने नहीं जाते! कैसे कह दें के तमाम अरमान हैं, रास्ते अलग हैं दुसरे सामान हैं,  मर्ज़ी की मज़बूरी के सब काम हैं, शिक़ायत है के बहुत आराम है! खुद से ही कई शिकायत हैं, पर वो हम कर नहीं पाते! कई शौक हैं मुक्कमल हमारे ओ शोक जो किनारे नहीं पाते!! खुद के ही सामने नहीं आते, ज़िक्र करते हैं सुन नहीं पाते! दूर नहीं हैं अपने उसूलों से, पर उतने नज़दीक नहीं जाते!! धुरी भी हम, चक्का भी हम, हम ही सवार हैं! दूरियां तय नहीं होती, हम ही जिम्मेदार हैं!! ख़ुद से बग़ावत  हम कर नहीं पाते, संभले हुए हैं इतने, बहकने नहीं पाते!