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आज़–कल

आज़ की सोच फिर कल की बात करते हैं, गुजरते सच को भला क्यों हालात करते हैं? हदें सारी सिमट गई हैं आज तंग यकीनी में, हमराय न हुए तो कातिल जज़्बात करते हैं! मोहब्बत यूं भी गरीब है तमाम सरहदों से और फिर ये बाजार जो हालात करते हैं! यूं नहीं के इंसानियत बचीं नहीं है कहीं, पर बस अपने ही अपनों से मुलाकात करते हैं! तालीम सारी मुस्तैद है सच सिखाने को, वो शागिर्द कहां जो अब सवालात करते हैं! कातिल हैं मेरे वो जो अब मुंसिफ बने हैं, और कहते हैं क्यों खुद अपनी वकालात करते हैं! फांसले बढ़ रहे हैं दो सिरों के मुसलसल, ताकत वाले बात भी अब बलात् करते हैं! हमदिली की बात अब डिज़ाइन थिंकिंग है, बेचने को बात है, सो ताल्लुकात करते हैं! दीवारें चुनवा दीं हैं रास्तों में किसानों के, सुनने की इल्तजा पर घूंसा–लात करते हैं! [तालीम - education; शागिर्द - student; मुसलसल -continuous; हमदिली- Empathy ;  बलात्  - by force ; इल्तजा - request] 

हमारी दुनिया_दारी, दुकानदारी!

हमारी  दुनिया, हमारे लोग हमारा घर हमारा परिवार हमारे साथी हमारा समुदाय हमारी दुनिया मेरा घर   तुम्हारा घर मेरे लोग तुम्हारे लोग मेरा परिवार तुम्हारा परिवार मेरे साथी तुम्हारे साथी मेरे बच्चे तुम्हारे बच्चे मेरी औरतें तुम्हारी औरतें मेरी इज्जत तुम्हारी इज्जत मेरा समुदाय तुम्हारा समुदाय मेरी ताकत तुम्हारी कमजोरी तुम्हारी ताकत मेरी कमजोरी मेरी बंदूक तुम्हारी बंदूक मेरी लड़ाई मेरी जीत तुम्हारी हार मेरी जीत   तुम्हारी जीत मेरी हार   तुम्हारा नुकसान मेरा फायदा मेरा नुकसान तुम्हारा फायदा तुम्हारी बर्बादी, मेरी ...? मेरी जीत? मेरी जीत मेरी हार! बिखरा समुदाय टूटे घर भूखे पेट अनाथ बच्चे कैसा परिवार ? मैं बर्बाद तुम बर्बाद कौन आबाद ? मेरी लड़ाई तुम्हारी लड़ाई किसकी कमाई ? मेरा पैसा तुम्हारा पैसा किसके पास ? मेरी भूख तुम्हारी भूख मेरे दर्द तुम्हारे दर्द मैं चुप तुम खामोश खामोशी में हम हमारे सच हमारी ज़िंदगी हमारा परिवार हमारे बच्चे   हमारी दुनिया !

रंग बेरंग!!

जमीं नहीं रही अपनी, पैर टूट गए, रहसह के बस मेरे पंख छूट गए! उड़ने के सिवा अब चारा नहीं, इस तरह वो मेरे रास्ते लूट गए! खून से अपने ही महक आती है, नफ़रत को सब, अपने जुट गए! बस एक रंग में सब बातें करनी हैं, मेरे आंगन के सारे मौसम उठ गए! कौन कहता है कि दुनिया मेरी हो, लाइब्रेरी से वो शब्दकोश हट गए! मेरे तुम्हारे अब हमारे नहीं रहे, यूं रिश्तों में मायने सिमट गए! सब के सच अब अलग अलग हैं, ये बोल सब महफिल से उठ गए!