कहने को तो जहाँ है, फिर भी ना बाहर आये क्यों.. करीब सारे निशां है, गोया नजर न आये क्यों... खुद पर मुसलसल नजर है, कहे मोहब्बत कोई ... नज़दीक आने का अंजाम, खामियां ही नजर आये क्यों... हमारी शिकायत हमसे ही होती है बारहा... मुश्किल में मुश्किलें है, खुद को आसां बनाए क्यों... यूँ ही नहीं की हमको कोई शिकायत नहीं होती ... जो जख्म नजर नहीं आते उनको भला दिखाएँ क्यों... यूँ तो हमको भी शिकवे हैं छोटी-बड़ी बातों के, यूँ उनको सब मालूम है और हम बतायें क्या! हमारी भी खूबियां हैं वो कहते बताएं क्या, दिल में दी है जगह अब सर पर बैठायें क्या! रोज किसी न किसी बात पर प्यार आता है, आदत सी पड़ गयी है, अब इसमें बतायें क्या!! इरादे यतीम ना होंगे अज्ञात यकीं की जमीं पर.. बंजारे हों जब मिज़ाज़ के, सफ़र मुकां पर आये क्यों...
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।