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इश्क़ समझ!

इश्क़ इज़हार है, समझदा र को इशारा नहीं, चलते बनिये जो उनको गवारा नहीं, खेलते खुजाते रहें, जिसे ज़ेब में रख्खा तमाशा नहीं,   इश्क़ जज़्बात है, मर्दानगी त्योहार नहीं, और बांट दे वो खुशी से  "हां", उनकी, दिवाली का खील बताशा नहीं! हंसकर बात करते हैं, ये हस्ती है उनकी, खुद को पसंद करते हैं, मुगालते हैं आपके, जो सोचे, आप पर मरते हैं!! इश्क़ साथ है,  दो लोगों की बात है, मिल्कियत नहीं, कोई मेरा हो गया, मान लेना, रिश्तों की नज़ाकत नहीं! इश्क़ सफ़र है, हमसफ़र सी बात है, मंज़िल नहीं, हासिल हो गया, बात ख़त्म, आशिक़ी की तर्ज नहीं! इश्क़ इज़हार है, इंकार है, इसरार है, इम्कान है, आसान नहीं, बात चलती रहे, हर सूरत जज़्बातों का मर्ज़ नहीं!

प्यार कोरोना - Love in the time of Corona

प्यार में एक दूजे के मजबुर कर दिया हम ने खुद ही खुद को दूर (3 फीट) कर दिया साँसों से सांस मिली तो बात बढ़ जाएगी, इसलिए मास्क पहनने पर मजबूर कर दिया! पहले चिढ़ कहते, क्यों हाथ धो पीछे पड़े हो, अब हाथ धोते देख कर गज़ब मुस्कराते हैं!! यूँ तो साथ जीने मरने की कसम खाई है, दूर हो गए जबसे उनको खांसी आई है! धड़कने बढ़ जाती हैं बस देख के उनको, पर आजकल ये देख कर वो सहम जाते हैं! जो भी नज़दीकी थी अब दिल में रह गई, कहते हैं अब तो हम और पास आ गए?   ज़ुल्फ़ों तले गुजरेगी शाम ये वादा था पक्का, छंटवाते थे जो जुल्फें आज कटवा कर आ गए!! पहले अदा से इतरा के हाथ में ख़त थमाते थे, अब वो देख कर दूर से ही ताली बजाते हैं! तन्हाई में तस्वीर से मेरी बोलते होंगे, सोचा, ख़बर आई है कि मेरी कोविड रिपोर्ट ढूंढते हैं!!

सुमित सुमीत!

कथनी से करनी बड़ी, कहे दास कबीर, यूँ प्यार से नफ़रत जीते वो ही सच्चे वीर! वो ही सच्चे वीर कि जो दर्द हो जाएं, आँसू जिनके चोट का मलहम बन जाएं! बने चोट का मलहम चलो ये रीत चलाएं, नफ़रत के मारों के चलो सुमीत बन जाएं! बनें सुमीत सब ऐसे कोई न पड़े अकेला, इस दुनिया को करे बहनचारे का खेला! बहनचारे का खेला नहीं सिर्फ़ ये भाईचारा, शामिल हों इसमें सब, नहीं खासा-प्यारा!  हर कोई खासा-प्यारा यही तो है मानवता, यकीन मानो है हम सब में ये क्षमता! क्षमता कितनी हम सब में ये न पूछो, बुद्ध हुए अपने ही बीच, कबीर सोचो!! (एक इंसान से मुलाकात हुई, बात हुई, इंसानियत पर हुए ज़ख्मों का दर्द उनकी आंखों में नज़र आया, वो भी एक डर होता है जो हाथ आगे बढ़ाता है गले लगाने के लिए, ये बात समझ मे आई)

#ThinkBeforeYouVote !!

सुबह सो रही है, जाग रही है या भाग रही है? रुकी है कहीं या अटक गई है, या अपने रास्ते भटक गई है? रोशनी की शुरुवात है या अंधेरों से निज़ात, या डिपेंड करता है क्या मजहब, क्या जात? सुबह बन रही है, या हमको बना रही है? शिकायत कोई? किसको सुना रही है? इंतज़ार करें? हाथ पर हाथ धरें? माथे जज़्बात करें? किससे क्या बात करें? सब राय हैं? हक़ीकत? नीयत? यक़ीन! यक़ीनन? डरे हुए हैं! शक़ से भरे हुए हैं! झूठ तमाम से तरे हुए हैं! फ़िर भी, चाहे कुछ, सुनिए, कहिए, गहिए, दिल में रहिए या ज़हन में! रोशनी, रोशनी है, अंधेरा अंधेरा! रोशनी भी भटकाती है! अंधेरा रास्ता भी दिखाता है! उनकी कोई धर्म-जात नहीं, उनको फ़ायदे-नुकसान की बात नहीं! आप तय करिये आप देख रहे हैं? या अपनी नज़र के ग़ुमराह? #ThinkBeforeYouVote 

मोहब्बत!

मोहब्बत क्यों ये मुश्किल काम है? पहलू में उनके सुकूँ, आराम है! क्यों दुनिया में आशिकी बदनाम है? उनकी शिकायत, ये जरूरी काम है! फिक्र है मेरी ये उनका काम है, ये समझ लेना सफर का नाम है! सब शिकायत है मेरी ख़ामोशी से चुप हैं हम और खासे बदनाम हैं! नज़र जब भी नज़रिया बन जाए, समझ लीजे किसी का काम तमाम है! ज़िंदगी जी रही है ख़ूब दोनों को, हम हैं साकी और वो जाम है! मोहब्बत गहरी पहचान है, सुबह मेरी ओ उनकी शाम है!

रहने दो!

मुश्किलों को तुम मेरी आसान रहने दो, अभी खुद को तुम मेरी जान रहने दो! ज़िन्दगी सफर है बस यही काम रहने दो, मंजिलों को अभी ज़रा अंजान रहने दो! भूल जाएं सब शिकायतें ओ शिकवे सफर में ज़रा कम सामन रहने दो! तुम ही हो मेरी दुनिया में और क्या, ये दुनिया बस मेरे नाम रहने दो! आईना भी और परछाई भी हैं दोनों, लाज़िम है यही, यही पहचान रहने दो! साथ हैं बस उसी में सारी बात है, ज़ाहिर हैं, वही मेरे अरमान रहने दो!

ज़िंदगी आसान - निशा आदित्य टाईप!

साथ आपका, सफ़र साथ का, ज़िंदगी इतनी आसान चाहिये! बहुत किया इंतज़ार ज़िंदगी, साथ साथ ही काम चाहिये! आपस में ही पटना-निपटना है! बस और क्या अब काम चाहिये? बचपन पास है, ज़वानी साथ है,  बस उतना ही सामान चाहिये! ढूँढ ली जगह दिल में रहने कि, हमको कहाँ कोई मकान चाहिये जिसको देखो ' हमें मालूम था' फ़िर भी सबको एलान चाहिये! इश्क़ लम्हा, हमसफ़री रास्ता है,  ऐसेइ थोड़े हमको प्लान चाहिये? जो है सो है, सीधी सी बात है,  इसमें क्यों कोई विज्ञान चाहिए? अपने हिस्से की दुनिया हम बदल लेंगे, अभी शुरू है बस थोड़ा टाइम चाहिए!

अमृता प्रीतम

अपनी ही खामोश समझ को नकार है मर्द को अगर औरत की ताकत से इंकार है! कोई लफ़्ज़ ज़ब ज़ुबां तलक आते हैं, खत्म हो जाते हैं! अगर बचा लिया किसी ने, तो एक कागज़ उतरते है,  और वहीं ढेर हो जाते हैं! रूह पर कुर्बान होने पेश,  लबों से लरज़ते हमारे नाम, एक मुक्कदस आवाज़ बनते हैं! (मुक्कदस - Sacred) ज़रा दूरतलक देखिये, सच्चाई और झूठ के बीच 'जगह' है!  ज़रा खाली! दर्द था, खामोशी से मेंने एक कश सिगरेट के माफ़ि खींच लिया, चंद शेर बचे थे, कुछ कलाम, जो छिटक दिये मेंने राख करके! एक बार एक हीर के अश्क, और 'हीर-रांझा' तुम्हारे, आज हज़ार आँखे रोती है,  बुलाती हूँ तुम्हें, वारिस शाह! (https://en.wikipedia.org/wiki/Ajj_aakhaan_Waris_Shah_nu) कोशिश है कि सुरज किरण बन तुम्हारे रंगों से लिपट जाउं, और जो तस्वीर तुम करते हो, उस में सिमट जाउं! खाक होने के बाद, ज़रा ज़र्रों को समेट एक रेशा बुन कर, बन कर, फ़िर उस छोर तुम्हें मिलुंगी! फ़िर तुम्हारी याद, आई फ़िर आग मेरे ओंठ आई, इश्क़ ज़हर का प्याला सही, मुझे फ़िर भर प्याला ही! बहुत अफ़साने हैं, जो कागज़ नहीं उतरे, वो दर...

अपनी तस्वीर

फर्क नहीं पड़ता कोई, कि खुदा एक है या कई, जरा बताओ, दुनिया की चारदीवारी के बीच, तुम घर हो, या  न घर के न घाट के? क्या तुम हारना जानते हो,  खुद या किसी और के ज़रिये? क्या तुम तैयार हो जीने के लिए, इस दुनिया में, तुमको बदलने, इसकी सख्त जरुरत के बावजूद? क्या तुम पीछे नज़र डाल ये यकीं से बोल सकते हो कि हाँ मैं सही था!? मुझे ये जानना है, कि क्या तुम जानते हो रोजना ज़िन्दगी को झुलसाने वाली, आग में,  पानी होकर अपनी हसरतों के चक्र्वात में, कैसे पिघलते हैं? मुझे ये बताओ, क्या तुम तैयार हो, जीने के लिए, हर दिन;  रोज़ाना! मोहब्बत के नतीजों से और। और अपनी तय हार से उपजे, तुम्हारे सरसवार कड़वे जुनून से? मैंने सुना है,  इस जकड़ती आग़ोश में,  भगवान भी खुदा का नाम लेते हैं!

इतफ़ाकी मोहब्बत अपवादी इश्क़!

हाथ पकड़ लेंगे मंझधारे, साहिल कब से सोच खड़े हैं, बरसों से रस्ता तकते धारे हैं, सोच किनारे किस बात अड़े हैं! पहली नज़र का प्यार क्या है? एक उम्र इंतज़ार क्या है? हमेशा रहेगा एतबार क्या है? सर पर भूत सवार क्या है? इश्क एक एहसास है, एक लम्हा कोइ खास है क्यों उम्र भर उम्मीद ओ' सात जन्म कि बात है? मोहब्ब्त में हर घड़ी जन्नत है, फ़िर क्यों सात जन्म की मन्नत है? इश्क जिस्म है तो तमाम हैं, रुह है तो एक है, इतेहाद है, ज़ज़्बात है तो पल की बात, सोच, एक ख़याली पुलाव है! दो दिल मिल जाऐं तो इश्क है, ख़्यालात एक हों तो इश्क़ है, मुख़ालिफ़त दिलकशी की बात, क्यों किसी को किसी से रश्क है? इश्क़ घरफुँक तमाशा है, जन्नत नसीबी का रास्ता है, कोई एकदम अकेला इसमें, किसी का दुनिया से वास्ता है! जिस इश्क़ में सब जायज़ है, वो सोच कितनी नाज़ायज़ है?

कैसे कहें कि इश्क़ है!

शौक इश्क है, कद्र इश्क है, समझ सके किसी का, वो दर्द इश्क़ है! इश्क़ नज़र है, मिलना, झुकना, फेर लेना, तरेर लेना, चुराना, नचाना कभी बचना, कभी बचाना इश्क इलाज़ है, मर्ज़ नहीं, रवैया है दिल का, फ़र्ज़ नहीं,  बचपन है, बचपना नहीं, सोच में पड़ गये, फ़िर इश्क़ क्या? इश्क़ सफ़र है, रुकने का नाम नहीं, क्यों आप किसी जिद्द पर अड़े हैं? 'हम ऐसे ही' तारीख़ हो गयी बात है, हाथ में हाथ है अब बदले हालात हैं! इश्क़ एकतरफ़ा ही होता है, इसमें इतफ़ाक तमाम होता है! जरुरत होती है किसी को, कहीं फ़क़त ज़ज़्बात होता है! इश्क़ ज़ज्बात है, हरदम किसी का साथ नहीं, अपने से भी कीजे थोडा, यूँ बुरे हालात नहीं!! इश्क़ नज़र है, हरदम नज़र मिलने की बात नहीं, अपने गरेबाँ झांकिए ये आइनों की बात नहीं!! वो लम्हा जब आसमाँ के नज़दीक खड़े, बादलों से बतियाना इश्क़ नहीं तो क्या? और अचानक नज़र आये फूल को उठा, सूंघ कर मुस्कराना इश्क़ नहीं तो क्या! रास्तों में एक मोड़ है इश्क, मुसाफिरी आशिक़ी का नाम है! क्या फर्क पड़ता है हमसफ़र, कौन, और कितनी दूर कोई मक़ाम है?

देखा-देखी!

ख़्वाब में ख़्वाब को सच होते देखा, दूर थे फिर भी बहुत नज़दीक देखा! जब भी देखा उनको बड़ा मसरूफ़ देखा, कभी खुद को देखें, कभी मेरी तरफ देखा, जब भी देखा यकीनन गौर से देखा, कौन जाने आशिक कि गुनहगार देखा, जब भी देखेंगे तो मुस्करा देंगे, इस उम्मीद में एक उम्र देखा, नज़दीक से गुजरे ओ बड़ी दूर थे, समझ न आये उस अंदाज़ से देखा आइनों की जुबाँ कब सीखि है, ओ हम से ही पूछे हैं ऐसा क्या देखा, उनको देखा तो हरदम हंसी देखा, खुद को देखा तो हरदम यकीं देखा! हम देखते ही थे की उसने हमको देखा, समझ न आये, ‘देखा’ कि देखते देखा! उनकी नज़र से जब खुद को देखा, फ़िक्र देखी, फक्र देखा, असर देखा

दिल और मुकम्मल मोहब्बत!

दो दिलों के बीच एक झरोका है, दो ज़िस्मों से फ़रक जो हमेशा अलग हैं, दो चिराग एकरूप न हों, जब रोशन होते हैं तो एकात्म हो जाते हैं आशिक की तलाश अंजुमन नहीं, जब तक चाहने वाले की भी तलाश यही न हो, आशिकों की आशनाई उनका ख्याल बनती है, दिल-ए-अज़ीज़ की मोहब्बत, हमें मुकम्मल और रोशन करती है! - रूमी अफ़सोस न करो, जो भी खोया है, कुछ और बनकर वापस आता है, ज़ख्म वो जगह हैं, जहाँ से रोशनी हमारे अंदर का रस्ता ढूंढ्ती है, प्यार करने वाले आखिरकार कहीं नहीं मिलते, वो हमेशा से ही एक-दुसरे में मौज़ूद हैं,  प्यार को खोज तुम्हारा काम नहीं है, काम है उन सारी दीवारों को गिराना,  जो तुम्हारे रास्ते आती हैं और, जो तुम ने अपने अंदर बनाई हैं! जब तुम्हारी रूह तुम्हारा काम करती है,  एक दरिया अंदर बह उठता है, आनंद का, क्यों अपने को कैद कर रखा है? जब दरवाज़ा पूरा खुला हुआ है? ये मोहब्बत है,  आगे के अंजाने आसमानों तक ले जाने वाली, हर पल हजार पर्दों को हटाने वाली,  पहले . . .  ज़िन्दगी से अपनी पकड़ छोड़,  और फ़िर एक कदम आगे, बिन पैर, अपनी होशियारी ...

नज़र नजरिया नज़रअंदाज़!!

अंदाज़ इ नज़र से क्या अंदाज़ लगाएं, दिल की सुनें या अपना दिमाग लगाएं! मोहब्बत हरदम एकतरफ़ा ही होती है एक दूसरे से हो ये महज़ इत्तफ़ाक़ है! क्यों अफ़सोस है की आप नज़रअंदाज़ हैं, मोहब्बत ज़ेब में रख घूमने की चीज़ नहीं! इश्क़ है तो इंकार नज़रअंदाज़ क्यों, प्यार एहसास है दिल धड़काता है, सामान नहीं जो ख़रीदा जाता है??? अंदाज़ लगाएं उनकी नज़र से या नज़रअंदाज़ करें, समझ नहीं आता कहाँ से अफ़साना ए आगाज़ करें! बहुत सी अदाएं उनकी ओ एक अंदाज़ ए नज़र, तमाम तूफ़ान पाल रहे हैं और उस पर ये कहर! सच है कि उसने हमें नज़र अंदाज़ किया हमने भी इस सच को नज़रअंदाज़ किया! यूँ अब उनकी नज़रों के अंदाज़ हो गए, नज़र आये नहीं की नज़र-अंदाज़ हो गए? जब से उनका अंदाज़-ए-नज़र देखा, अपने आप को नज़र अंदाज़ कर दिया! अंदाज ए नज़र को नज़रअंदाज़ कीजे, दिल की बात है दिल से समझ लीजे! अंदाज़ नज़र का नज़र अंदाज़ कर दिया, हमने आगाज़ किया उसने अंजाम दे दिया!