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मशकूर मुसाफ़िर

इंसान होने का सफ़र, और उसका असर हर ज़ज्ब करती नज़र से हर मुस्कराहट से खुले दिल और फ़ैली हुई बाँहों से खेल है ये बच्चों का कहने को कुछ नहीं करना ही उनका कहना है, कुछ उम्मीद से मेल खायेंगे हमारे इरादे और हरकतें, ओ' इस के लिए हम मशकूर हैं! We travel to become human and human we become with every glance with every smile with open heart  and welcome arms It is indeed a child’s play for they need not say they show the way believing we may Unite in our intention and action, for that we are grateful

कुछ करते हैं!

  इरादे ताकत करते है, इरादों कि इबादत करते हैं, जो सामने है वही सच है, इस बात से हम बगावत करते हैं, मोहब्बत ज़ाहिर करते हैं, कलम सर को हाज़िर करते हैं, उनकी बात उन्हीं को नाज़िर करते हैं, कोई शक! काफ़िर करते हैं   पसंद, दावत करते हैं, काम, कवायत करते हैं, छुट्टी, शायद करते है, कुछ नहीं तो करामत करते हैं!  जो सोचते हैं सच करते हैं, मुश्किलें आयें तो पच करते हैं, शक सामने हो तो 'च्च' करते हैं कभी कभी टू मच करते हैं! रवायत को हम 'धत' करते हैं, मज़हबी बातों को 'But' करते हैं, आप करिये हम हट करते हैं, बात सच है सपट करते हैं!   रास्तों को घर करते हैं, मकाम साथ सफ़र करते हैं, अकेले नहीं हमसफ़र करते हैं, आईये अक्सर करते हैं किसी से नहीं कंपेर करते हैं, अपने यकीनों को जिगर करते हैं, हो जायें आप बुलंद, लगे नहीं वो नज़र करते हैं,

एक और अज्ञात!

अज्ञात है और मेरा मित्र भी, एक कोशिश है एक चित्र भी सामान्य है और विचित्र भी सीमित है पर सीमा नहीं जीवित हैं पर जीना नहीं सब कुछ ठीक है, और सब कुछ बदलना है रास्ता बना नहीं फिर भी चलना है, सपने हकीकत हैं, जो बोले शब्द वो जीवित हैं, अपनी ‘गति’ के समाचार, और खबर बुरी नहीं है, सच्चाई छुरी नहीं है, क्योंकि होता वही है जो तय है, और चाल आपकी, आपकी शय है, मात नज़र की कमजोरी है, उम्मीद कि न दिखे फिर भी डोरी है वैसे भी आँख के सामने गर अँधेरा है, तो हाथों को हवा कीजे, यकीन की दवा कीजे , और मारिये एक छलांग, जमीन से गिरे भी तो कहीं नहीं अटकते, एक दो तीन,...... धड़ाम देखा, न चींटी मरी, न आप , पर तबीयत हरी हो गयी! चलिए अब नए सिरे से सोचें बोलने वाले तो कुछ भी बोलेंगे!

दर्द-सर्द-गर्त!

दर्द हो कर भी नहीं हैं ये लम्हे मेरे साथ हैं पर पास नहीं हैं आस हैं पर आराम नहीं है हलचल तूफान की, पर आहट नहीं है अब किनारो पर राहत नहीं है डूब जाना, जी करता है, पर काफी होगा क्या तैरना आता है, उसका क्या?   सर्द कुछ साँसे, अलग सी आहट भी नहीं करती, एहसास जगा जाती हैं, अनजाने रास्ते, अजनबी क्यों नहीं लगते घबराहटें क्यों मुस्कराती हैं, मेरे इरादे, नक़्शे, मेरे कदम, फिर क्यों नई-सी है धड़कन ये चमक कैसी आँखों मैं है संभावनाएं, सामने न सही, उनकी आहट कानों तक पहुँचती है, खामोश साँसे सुनाई देती हैं, घेर लेती हैं, घर करती हैं, सर्द! गर्त कितनी सतहों तले गर्त के, सच जमे हैं, नज़र कहाँ से आयें? मेरे, तुम्हारे, सबके, क्यों? क्या? अलग अलग हैं? मैं , मेरा, अपना, खुद की,  यकीन, सोच, तजुर्बा, खुश्की, चुस्की, जरूरतें किसकी परिभाषाएँ, उम्मीद, आशाएं कितनी परतें हैं, एक को अनेक करती, साफ़, कुछ भी, कैसे हो? है, धूल, पर सारी कोशिशें महज एक निशान हैं, सतह पर रहते, गुनते, चुनते, बुनते सारे सच कफ़न है, गर्त के!