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खामोशी!

  खामोशी की आवाज सुनी है कभी, उसमें आहट भी एक शोर होती है, एक आह भी घनघोर होती है, कोई कराह दे तो जैसे दर्द के सागर झलकें, कोई सराह दे तो सर आसमान, खामोशी में बड़ी जान होती है, सुनिए, मुश्किल आसान होती है! खामोशी से चाह हुई है कभी? कि उसमें इंतजार भी एक सफ़र है, नज़र उठ जाए तो सहर है, झुक जाए तो कहर है, मुस्कराहट चार पहर है, साहिल से "दो·चार" लहर है! खामोशी की राह चुनी है कभी? नज़र ही इकरार है, नज़र ही इंकार है, नज़र ही इसरार है, नज़र ही नफ़रत, नज़र ही प्यार है! गौर कीजिए क्या आसार है? खामोशी से बात की है कभी? उसको सुनना भी कहते है! और फिर गुनना भी, रिश्ता बुनना भी कहते हैं, सही लम्हा चुनना भी, खामोशी मांगी नहीं जाती, सब के पास है, बहुत काफी और काफ़ी खास है! रुकिए ज़रा, दो घड़ी ठहरिए, सुनिए खुद को, श श शश, खामोशी बोल रही है!

धीरे धीरे ... और खत्म?

 आप धीरे धीरे खत्म होते जाते हैं, अगर आप सफ़र को नहीं जाते हैं, अगर आप कुछ बांचते नहीं, ज़िंदगी को उसकी आवाजों से भांजते नहीं, आईनों में अपनी तस्वीर को मांजते नहीं  आप धीरे धीरे अंत हो जाते हैं, जब आप अपनी मान्यता मारते हैं अपनी तरफ़ बड़े हाथों को नकारते हैं, आप धीरे धीरे खत्म हो जाते हैं, अगर आप आदतों से अपने को बांधते हैं, रोज वही लकीर पीटते हैं - रोज के सधे हुए दिन को साधते हैं, अगर आप नये रंगो को नहीं पहनते, किसी नये को नहीं चीनते, आप धीरे धीरे काफ़ूर हुए जाते हैं, अगर आप दीवानेपन से कतराते हैं, और उसकी रवानगी से, जो आपकी आँखों को नम करती है, दिल की धड़कनों को चरम करती है,  आप धीरे धीरे नासूर हुए जाते हैं अगर आप अपनी ज़िंदगी नहीं बदलते उस वक्त ज़ब आपको, आपका काम नहीं चलता, रिश्ते में दिल नहीं पलता और आपको अपना माहौल नहीं फ़लता अगर आप अपनी यकीनी को जोखिम नही सिखाते, उसके लिये जिसका कोई ठिकाना नहीं, अगर आप किसी सपने का साथ नहीं देते, अगर आप ज़िंदगी में कम से कम एक बार, अपने को ये इज़ाज़त नहीं देते, कि भाग खड़ॆ हो नेक नसीहतों से - पा...

एक सफ़र मुसाफ़िर होने का!

क्या मैं तैयार हूँ , जाने को , या फ़सा हूँ , अपनी जिंदगी भुनाने को , हाथ आई चीज़ कौन छोड़े , वो भी मुफ़्त की , बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं , आज़ - कल बड़ी खुशी से खो रहे हैं हालत पतली है , अपने सर न आये , हो कहीं भी पेशी , हो जायेंगे खड़े सर झुकाये! पर वो दिन किस ने देखा है? अभी तो बस इकट्ठे कर लो , दिन पे दिन , साल पे साल , और उपर से ऐंठ कि उम्र बड़ी है , आपको देख कर चली घड़ी है , पर सच की किसको पड़ी है , सब अपनी मंज़िलों के बीमार हैं , क्या मज़ाल कोई कह दे कि जाने को तैयार हैं , सारी मेहनत खुद को बहकाने की , खुदा आपको लंबी उम्र दराज़ करे , जुग - जुग जियो , साल कि दिन हों पचास हज़ार , क्यों नहीं कोई दुआ देता कि आप कि मौत आप को इंतज़ार न कराये , और बोले भी कौन क्योंकि मौत बदनाम है , बेवज़ह , अगर सोचें तो , सच्ची है , ईमानदार है , और सच कहें तो यही है एक जिसको जिंदगी से सच्चा प्यार है , कभी साथ नहीं छोड़ती , मुँह नहीं मोड़ती , खैर जाने दीजिये ,  बात जिंदगी और मौत की नहीं , हमारी है , मेरी है , ...

सोती सभ्यता!

खोज, शोध, अविष्कार, तलाश परिपक्व, पुर्ण, सम्पुर्ण तक पहुँचने का विचार जीवन का अर्थ पाने के लिये, जीवन का तिरस्कार? कमजोरियॊं को अलग कर, पुर्णता पाने का प्रयास? पर सोचो! बिना अंधकार प्रकाश का क्या अर्थ मृत्यू नहीं तो कौन तलाशेगा, जीवन-अर्थ सरल सा विचार है,  Nothing is Perfect अर्थ?  कुछ भी पुर्ण नहीं, परिपक्व नहीं अनर्थ समझ-समझ की बात है! प्रकृति के साथ हमारी दौड़ में प्रकृति को पीछे छोड़ने की होड़ में ज्ञान के अंहकार में कहीं हम सब कुछ नज़रअंदाज़ तो नहीं‌ कर रहे ? इस तेज़ रफ्तार जिंदगी में हम कुछ ज्यादा आगे तो नहीं‌ निकल आये? जरा पीछे जायें! पुरानी कहावत है “जो बोओगे, वही काटोगे" पर आज कल गंगा उल्टी बह रही है हम ने काट लिया है अब बो रहे हैं ऐसा नही लगता ___? हम इस सभ्यता में भी सो रहे हैं?

खोना या होना ?

कुछ फरक नहीं पड़ता अगर मेरे होने का क्या असर होगा मेरे खोने का पर कुछ इतना आसान नहीं काट रहे हैं खुद को वक़्त कहाँ अब बोने का रास्ते पर चल रहे हैं पर मुसाफिर कहाँ हैं? क़ैद अपनी, अपना जहाँ है! मुड कर देखा, क़दमों के निशां हैं, कैसे मिटायेंगे गुजरे भी तो नामोनिशां हो जायेंगे खुद को खोकर, ढूँढना है....