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मुक़म्मल शहर!

ज़िक्र होता है के वीरानों में सुबह होती है, मुक़म्मल शहरों में कहां ये जगह होती है? अपने लिए ही जीते हैं आप भी, हम भी, ज़िंदगी में और किस की जगह होती है? तमाम सच्चाइयाँ है समझने को चाहें तो, आइनों में सिमटी पर सारी वज़ह होती है! है सब की आंखों देखी, कौन मुश्किल में है खबरों में आए, तो ही अहमियत होती है? शहर का ट्रैफिक बन गयी है सारी जिंदगी, रुकने ठहरने की और क्या वजह lहोती है? सब को चाहिए एक सरपरस्त दिलासा देता! डरा के रक्खा जिसने उसकी फ़तेह होती है? कितने सवाल हैं जो अब गुनाह बन गए हैं? कोई न पूछे क्यों रातों को सुबह होती है? फांसले इतने बढे के अब आसमां करीब हैं! कहाँ आजकल दिलों में वैसी जगह होती है? वो कोई और दौर थे के जब करिश्मे होते थे? तमाशा है अब ओ करतब पर नज़र होती है! कल मान जाएंगे सब के हम गुमराह थे! आज के क़त्ल की जायज़ वज़ह होती है! हवाएं तमाम इशारों से मायूस करती है, सांस लेते हैं और उसकी चुभन होती है! सफ़र तय है पर रास्ते अभी बने ही नहीं!  पूछे कोई 'अज्ञात' कैसे सुखन होती है?

आज़ादी के गुलाम!

किसकी मज़ाल की आज़ादी पर सवाल करे, पुलिस, अफसर, जज, पत्रकार सब साथ हैं! कश्मीर से आज़ाद हैं? कश्मीर में आज़ाद हैं?  कश्मीर के आज़ाद हैं? या क्या फ़र्क पड़ता है? भारत की सरकार आज पूरी आज़ाद है,  जिम्मेदारी से, जवाबदेही से, रामकृपा! ऐसी भी क्या आज़ादी के ख़ामोश बैठे हैं,  सब जानते समझते बोलती बंद हो गई? सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, या कोई दरबारी?  किस को न्याय है किसकी तरफ़दारी? सहूलियत की जंजीरें कैसे तोड़ दें,  आज़ादी के लिए कैसे मस्ती छोड़ दें! खामोशी आज़ाद है, सवालों को कैद है,  क़ातिल आज़ाद है बेगुनाह सूली चढ़ें! चुप रहिए कि आप आज़ाद हैं,  बोलने वाले सब बरबाद हैं!

अंधे आसमाँ 3

मेरी प्यारी बर्बादी अपने लिए अपनी ही हवस , ख़ुद को बनाएगी या मटियाएगी? एक हक़ीकत मेरी , मेरी कितनी सच्चाइयों को निगल जाएगी? मैं कम हूँ या ज्यादा कम? रिजल्ट हूँ अपना , या दुनिया का थन , किसी के हाथों निचुड़ता , पिघलता , रहने को आजाद , और बहने से बर्बाद? क्यों ने अपनी बर्बादी अपने हाथों ले लूं?

कारवां की तन्हाई!

कारवां कितने मासूम सफर मोहताज़ हैं,   हिफाज़त के कैसे देखेंगे अंजान ,  आँखों पर पर्दों कि आदत के ! गुलामी के दौर हैं चलो यही जश्न करें , सुनने को कान नहीं हैं, क्या प्रश्न करें? कवायत जारी है , दो कदम चले चलो , ताक में रखो सोच , हाथ बस मले चलो ! लेकर काँरवां चले थे , रह गयी बस रहगुज़र , कसर साथ में रह गयी ,  या साथ का ये असर ! तन्हाई सवाल बचपन के लिये सफ़र करते हैं , कुछ लोग ऐसे हैं ता - उम्र असर करते हैं ! किसको माफ़ करें , कहां मलहम लगायें , नस्ल कौन सी हो , फ़सल कहां उगायें ? जामा पहनते हैं दिखावट का ,  खुद ही खुद को मंजुर नहीं हैं , इश्क़ तो तमाम करते है ,  गोया मोहब्बत का शऊर नही है ! आखिर कब तक हमें इंसां होने का फ़कर होगा , हरकतों पर झुके सर , कब ऐसा जिगर होगा ?

सवाल क्या है?

जवाब तो मिल ही जाएगा सवाल क्या है? है न? क्यों तलाश करते हैं के मिसाल क्या है? मज़ाल क्या है! सवाल आपकी पहचान  और जवाब दुनिया की मान! सवाल रास्ता है, आपका अपने सफर से वास्ता है,  कहाँ चले? अगर आपके पास सवाल नहीं हैं, तो क्या मुमकिन,  आप किसी का जवाब बने हैं! सवाल तलाशिए,  जो हैं उनको तराशिए  तरकश खाली क्यों? सवाल सारथी हैं,  जवाब पहिऐं  आप क्या कहिए ?

आज़दी क्या?

क्या आप आज़ाद हैं, या अपनी जंजीरों के बर्बाद! (धर्म के नाम पर तोड़-फ़ोड, हत्या-बलात्कार, आसाराम, राधे मां और तमाम बाबा और स्वामी) कहिये कि कैसे सिर्फ हाँ बन जाएं, बेहतर है इससे कि बेज़ुबाँ बन जाएँ! (आर.टी. आई कार्यकरताओं की सरे-आम हत्याएं) अंधविश्वास विज्ञान है, मेरा भारत महान है! (झारखंड़ में ११ महिलाओं को ड़ायन बोलकर हत्या) आज़ाद हो इसपे शक मत करो, नासमझी गुनाह है इस दौर का? क्यूँ इस तरह आज़ाद हैं, सवालों वाले बर्बाद हैं? सर घुटनों में रखिये तो आप आज़ाद हैं जो सीधे खड़े है उनको हुकूमत सैयाद है (तीस्ता के पीछे बड़ी सरकारी ताकत) आज़ादी कहाँ हैं, ये प्रश्न जहां है! (हज़ारों जनसंघर्ष में‌ लगे कार्यकर्ता) बड़े आज़ाद हैं हुक्मरान सारे, ख़ासी मनमर्ज़ी शौक हैं उनके! (हमारे राजनेता) बड़ी मजबूरी है सबको आज़ाद दिखने की, और ये ड़र कि कहीं ज़ादा आज़ाद न दिखें! ( हम में से कई जो सरकारी / बदमाशी ताकत के सामने भीगी बिल्ली , रिश्वत देते वक्त मजबुर और बाद में गप करते वक्त गुस्सैल और देश भक्ति का नाम लिया तो ५६इंच सीने वाले बन जाते हैं)

आज़ादी किस से?

खुद से छुपने को आईने पे टिकते हैं , अपने ही हाथों बड़े सस्ते बिकते हैं ! सफ़ाई देने को तमाम बातें कहते हैं , अपनी ही गंदगियों से मूँ फ़ेर रहते हैं ! बढा - चढा के बातों से शान करते हैं , वतन परस्त सच्चाई बदनाम करते हैं , मुख़्तलिफ़ राय है नाइतिफ़ाक करते हैं , क्यों शिकन है जो यूँ आज़ाद करते हैं एक ही इबारत है सब बच्चे बेचारे पड़ते हैं , फ़िर क्यों आज़ादी के इतने झंड़े गड़ते है आज़ादी के गुलाम सारे एक चाल करते है , सच साफ़ न हो जाये कम सवाल करते हैं ! जख्म नासूर हो गये है माँ के दामन तले देशप्रेम सब क्यों आँखों पर पर्दे करते हैं!  बेगैरत अपने ही मज़हब के अमीर सारे , देख दुसरे को क्यों मुँह में लार करते हैं ? मुख़्तलिफ़ - different ; नाइतिफ़ाक - Disagree; इबारत -writing style

जश्न-ए-गुलामी!

चलो गुलामी के जशन बनाएँ वही ठीक है जो होता आया है, स्थिरता कितनी अच्छी चीज़ है, सब कुछ वही....! सही! ज़माना खराब है, नयी चीज़ क्या भरोसा? आज़ादी? बाप रे बाप! आज़ाद खयालात? यानी, सारी मुसीबतों की जड़! छूट जायेगी, बनायी है जो पकड़, बचपन से अब तक, कितनी मेहनत से, भावनओं में जकड़ आश्रित बनाया है, पालन-पोषण का यही सरमाया है, जी जान से किया है अपने पैरों पर खड़ा, उम्र लग गयी, भरने में खाली था घड़ा! कहते हैं, सोच को खुलने दो ख़बरदार, वर्षों की मेहनत मिट्टी में घुलने दो? आखिर कुछ सोच-समझकर ही सब कुछ “तय” है! दुनिया चल रही है, क्योंकि दिलों में भय है! आज़ाद हुए खयालात, तो डर भूल जायेंगे कड़वे सच, व्यवस्था के ठेकेदार कहाँ पचा पायेंगे, बात बढ़ जायेगी, जंग छिड़ जायेगी, और हम अमन पसंद हैं नाक-बंद कर लेंगे, अगर सामने गंद है, दुनिया जैसी है, वैसी ही रहने दो, कुछ आजाद खयालात, गुमशुदा होने दो, अच्छा है! जो “त्याग” करना, संस्कृति की शान है, दो पल शांत , सर झुकाएं चलो! गुलामी का जश्न मनायें!

अपने साथ या दूसरों के हाथ

कितने डर हैं, सामने,  उम्मीदें,  कितनी लावारिस कितने यकीन दिल के, मन्नतों से हैं खारिज मेरे रास्तों से क्यों मेरे अपने अजनबी हैं, क्यों नहीं शामिल, मेरे सफर में, खुद से क्या सवाल हों, कल ना कुछ मलाल हो, वो कैसे करीबी हैं, जो दूर करते हैं? वो कैसी मोहब्बत जो इज़ाज़त ही नहीं देती? मैं अपने साथ हूँ,  या दूसरों की बात? क्या समझे है कोई मेरे सच? ये सफर आज़ादी का है? या दूसरों की बेनामी गुलामी में शामिल होने का? मैं खामोश हूँ, रहूँ, बोलूं, बिख्लाऊं, खुलूं, खोलूं, कहूँ कहलाऊं, मैं अपने साथ हूँ, या एक होकर अकेली? पहेली?