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आज़–कल

आज़ की सोच फिर कल की बात करते हैं, गुजरते सच को भला क्यों हालात करते हैं? हदें सारी सिमट गई हैं आज तंग यकीनी में, हमराय न हुए तो कातिल जज़्बात करते हैं! मोहब्बत यूं भी गरीब है तमाम सरहदों से और फिर ये बाजार जो हालात करते हैं! यूं नहीं के इंसानियत बचीं नहीं है कहीं, पर बस अपने ही अपनों से मुलाकात करते हैं! तालीम सारी मुस्तैद है सच सिखाने को, वो शागिर्द कहां जो अब सवालात करते हैं! कातिल हैं मेरे वो जो अब मुंसिफ बने हैं, और कहते हैं क्यों खुद अपनी वकालात करते हैं! फांसले बढ़ रहे हैं दो सिरों के मुसलसल, ताकत वाले बात भी अब बलात् करते हैं! हमदिली की बात अब डिज़ाइन थिंकिंग है, बेचने को बात है, सो ताल्लुकात करते हैं! दीवारें चुनवा दीं हैं रास्तों में किसानों के, सुनने की इल्तजा पर घूंसा–लात करते हैं! [तालीम - education; शागिर्द - student; मुसलसल -continuous; हमदिली- Empathy ;  बलात्  - by force ; इल्तजा - request] 

काम की बातें

सब कुछ साथ है, जो गुज़र गई, वो याद है जो चाहिए, वो ख्वाब है , जो कहीं नहीं आपबीती है, जो सुन न सके, एक आह है, एक चाह है, एक राह है, हमेशा आपके साथ जब भी आप, चलना चाहें, कुछ बदलना चाहें! सब खूबसूरत है, मनभाए, लुभाए ललचाए, भरमाए, दिलचाहे, साथ सब का अकेलापन, तमाम बातें, अनकही, खामोशी, शोर मोहब्बत के, और अब ये दौर, नफ़रत भी मुस्कराती है, कितनों के दिल लुभाती है! अफ़सोस! चलिए कोई और बात कीजिए, कुछ हट कर, परंपराओं से, दकियानूसी विधाओं से, सट कर रहना, बीमारी है, देश को, समाज को, हम-आप को, नक़ाब पहचानने होंगे, धर्म-जात के, दूर से बात के, घर बैठे काम, आराम है, घर बैठे लाखों भुख को कुर्बान हैं!

क्या गुनिए, क्या गुनगुनाइए!

गोली मारो कहबे, मूरख सोच के नेता चुनिए सहनशील संस्कृति बीरों की कथनी सुनिए! कथनी के सब बीर, कही अनसुनी करिए, बातों के तीर बचने, चलीं अब बहरा बनिए! बातों के सब तीर, मलहम का कर बनिए फिसली हुई जबान जालिम कहिये-सुनिए कहिये-सुनिए सबकी, पर यूँ ना गुनिये काँटों का, का दोस् ,जीवन आप जो बुनिए? बुनिए जीवन ऐसा जिसमें जगह हो सारी, मैं, मेरा, मुझसे की न लगने पाए बीमारी! लगे बीमारी ऐसी तो पूरी उमर सताए, अपनी ही तस्वीर सजाने तू वक्त गवाए! वक्त गवाएं सारा के बने गोरा-सुंदर क्रीम बेचते मदारी बने कौन है बंदर? बंदर बने बली के, हैं छुरी में धार लगाते, मुंह में इनके राम, पीठ पर छुरी चलाते! छुरी पीठ पर जैसे बनी सरकारी नीति, मिट्टी पैरों के नीचे के बनी है रेती! रेत बन गए सपने सब हाथों से छूटे? टूट गए हैं कितने, कितने खुद से झूठे! खुद से झूठ बोल रहे उनको क्या समझाएं, कहाँ आगयी दुनिया और कहाँ अब जाए?

अभी यहीं। !

मौजूद हूँ हरसू, जहाँ से शुरू हुई, जहाँ विलीन, कहीं पतली लकीर, कहीं कुदरत की शमशीर झरना बन गिरती हुई, कहीं चारों तरफ फिरती हुई, समंदर में खोकर, कहीं मैंमय होकर! जहां भी हूँ, अभी, इस लम्हा हूँ, जीवित, ज़िंदा, जिंदादिल, न में काल थी, न कल होउंगी, इसी एक पल में, हूँ भी और गुम भी, अपनी परछाई नही हूँ! इस जगह और हज़ार मील दूर, मैं ही हूँ, और इसी घड़ी, कहीं उमड़ी, कहीं उफ़ान, कहीं सिमटी, कहीं वीरान और ये सब सच है,  इसी दौरान, आप क्यों हैं परेशान, हैरान,  आँसू, मुस्कान? जो जब है तभी सच है! कितना आसान सचमुच है! बहते रहिए! पर, अगर आप यादों में अटके हुए हैं, तो मुमकिन है सच से भटके हुए हैं, In awe of these words"..the river is everywhere at the same time, at the source and at the mouth, at the waterfall, at the ferry, at the current, in the ocean and in the mountains, everywhere, and that the present only exists for it, not the shadow of the past, nor the shadow of the future.." Siddhartha by Hermann Hesse. ...

हकीकत की माया!

वो इंसान ही क्या जो इंसान न हो? वो भगवान ही क्या जिसका नाम लेते जुबां से लहुँ टपके? वो मज़हब ही क्या जो इंसानो के बीच फरक कर दे? वो इबादत कैसी जो किसी का रास्ता रोके? वो अक़ीदत क्या जो डर की जमीं से उपजी है? वो बंदगी क्या जो आँखे न खोल दे? वो शहादत क्या जो सिर्फ किसी का फरमान है? वो कुर्बानी क्या जो किसी के लिए की जाए? वो वकालत कैसी, जो ख़ुद ही फैसला कर ले? वो तक़रीर क्या जो तय रस्ते चले? वो तहरीर क्या जिससे आसमाँ न हिले? वो तालीम क्या जो इंक़लाब न सिखाये? वो उस्ताद क्या जो सवाली न बनाये? वो आज़ादी क्या जिसकी कोई जात हो? वो तहज़ीब क्या जिसमें लड़की श्राप हो? वो रौशनी क्या जो अंधेरो को घर न दे? वो हिम्मत क्या जो महज़ आप की राय है? वो ममता क्या जो मजहबी गाय है, बच्ची को ब्याहे है? वो मौका क्या जो कीमत वसूले? …… फिर भी सुना है, सब है, इंसान, भगवान्, मज़हब, इबादत, क्या मंशा और कब की आदत! अक़ीदत और बंदगी, तमाम मज़हबी गंदगी! शहादत ओ कुर्बानी, ज़ाती पसंद कहानी! वक़ालत, तहरीर, तक़रीर, झूठ के बाज़ार, खरीदोफरीद! तालीम और उस्ताद, आबाद बर्बाद! आज़ाद...

कल आज और कल!

आज को आने की जल्दी पड़ी थी ताक लगाये थी, जिद्द पर अड़ी थी सुबह सुबह अब पांव पसारे पड़ी है, हम को जगा दिया, खुद सोयी पड़ी है! आज को कल होने की जल्दी पड़ी थी कतार लगाये लम्हॊं की भीड़ खड़ी थी मुंह छूपा के कितने लम्हे युँ ही गुजर गये जिद्द में खड़े कुछ आने से ही मुकर गये! कल को आस्तीन से झाड़ बैठे हैं, किसको खबर,कहां इसमें सांप बैठे हैं देखते हैं 'आज' क्या तेवर दिखाता है, हम भी अपनी चादर नाप बैठे हैं! आज को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, फ़िक्र कहां कि जाम आये, इल्जाम आये आईना साथ में और ताड़ लगाये बैठे है मुमकिन है, कल कातिलॊं में नाम आये! आज़ को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, कल के पन्ने अब पलटते हैं, कब कहां कौन सी बत्ती चमके उम्मीद के झाड़ से लटकते हैं! आज़ को आस्तीन से झाड़ के बैठे हैं, दिन भर गला फ़ाड़ के बैठे हैं टिप-टिप बारिश की आड़ में बैठे हैं मत कहना,बड़े लाड़ से बैठे हैं! आज को कल होने की जल्दी पड़ी थी कतार लगाये लम्हॊं की भीड़ खड़ी थी मुंह छूपा के कितने लम्हे युँ ही गुजर गये जिद्द में खड़े कुछ आने से ही मुकर गये!