एक सुबह देखी, जागती, भागती, थकी, कहीं आज़ाद, कहीं बोझे से लदी, उम्मीदें और आस लिए, कहीं भूख और आस लिए, कहीं बनती, सँवरती, जोश और होश लिए, कहीं टूटी, बिखरती, हताश ओ रोष लिए, कहीं खुली, कहीं बंधी लड़खड़ाती कहीं सधी, असीमित विस्तार, कहीं मुट्ठी में लाचार, मुमकिन! न? कहाँ आपकी नजर है? क्या आप पर असर है? क्या आपकी कमाई है? क्या सोच चुन आई है? आपकी नज़र, आपका फैसला है? या ज़हन में, चार गूंजते शोर का घोंसला है? क्या आपके सवाल ज़िंदा हैं? या आप अपनी कोशिशों के शर्मिंदा हैं? आप सुबोह को सुन रहे हैं? या फैंसले आपको चुन रहे हैं? "चार नज़र, चौबीस डगर, मुश्किल हर आसान, ता ऊपर आसमान है, ले तू भी कुछ ठान"
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।