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हमरास्ता!

  दूर आए, नजदीकियों के नज़दीक आ गए, फ़ांसले नहीं हैं फिर भी करीब आ रहे हैं! नज़र को नज़र में नज़र आ रहे हैं, दोनों ही अपने शौक फरमा रहे हैं! मिल कर मन के मौसम बना रहे हैं, और वहीं हैं हम, जहां जा रहे हैं! पहुंचना नहीं है कहीं पर जा रहे हैं, मुश्किल हैं रास्ते पर रास आ रहे हैं! मंजिलों के सौदागर बस बहका रहे हैं, रास्ते कहां जाएंगे, हम कहां जा रहे हैं? हम फकत इन रास्तों से आ जा रहे हैं, यूं धूप–छांव दोनों शौक फरमा रहे हैं! रास्ते ही हमको ठहरा रहे हैं, पूछें  पहुंचना नहीं है तो कहां जा रहे हैं?

हवा-पानी ज़मीं-आसमाँ

हवा ने जब छु कर अकेलापन दूर कर दिया, और कभी उसी ने याद दिला दी तन्हाई की!! हवा को खुल कर छू लेने दीजे, कई शिकवे जिंदगी के हवा होंगे! ज़िन्दगी कभी भी नीरस लगे, एक पत्ते पर ज़रा गौर कर लें! मौसम बिखरे पड़े है हर ओर जीवन के, हर पल मुस्कराने की वजह मौजूद हैं! नज़ाकत के दौर ख़त्म हैं, सच जलते हैं आजकल, सर्दी में हाथ सेंकने को!! कब समझेंगे कुदरत एक तोहफा है, कब मानेंगे तरक्की एक धोका है!! सर्दी सर्द नहीं अब, गर्मी पूरी उबल गयी, प्रकृति वही है हमारी हकीकत बदल गयी! ज़मीं देखिये आसमाँ देखिये, ज़रा अपना जहां देखिये, ऊँची इमारतों में बैठ, ज़रा अपने गरेबाँ देखिये! ये आसमां है आज, ये समां है, आप के मुस्कराने का सामां है! कभीकभार, संभल कर, पत्तों को देखें, ........ अपने को पहचानें! अपनों को?

तू हसीं मैं यकीं!

तू हसीं हैं मैं यकीं हूँ, तू ज़मीं है मैं ज़मीं हूँ, ज़रा सा तू, ज़रा सा मैं, इस फलक की ज़र कमी हैं, हमकदम भी, हमनशीं भी, रास्तों के नशेमन लिए, हमनज़र भी, हमसफ़र भी तू असर है, मैं कसर हूँ,  तू खबर ओ मैं ख़ामोशी, मेरे शोर की तू सरगोशी, तू मय भी ओ मयखाना, मैं साकी ओ मैं पैमाना, नाप रहे है अरसों से, एक दूजे को हम रोज़ाना,  पुरे नहीं पड़ते कभी भी, खर्च हुए पर बिन हर्जाना, ज़िक्र आया तो कह देते है, लाखों अफ़साने क्या क्या फ़रमाना, मिल जाएँ गर किसी मोड़ तो, मत कहना की न पहचना!

ज़रा हम ज़रा कम!

बहुत चलाली,दुनिया, तूने! चलो आज थोड़े हम हो जाएँ! अपने लिए ही तो है, क्या फ़िक्र जो थोड़े कम हो जाएँ! घूम रहे हैं या खुद को ढूंढ रहे हैं, अपने ही कानों में बहुत गूंज रहे हैं! पास आ गए अपने के दूर हो गए? आईने कुछ ऐसे चकनाचूर हो गए! नज़र में हैं खुद की और खुद नज़र आते हैं, अक्सर हम बड़े खुदगर्ज़ नज़र आते हैं! यूँ अक्सर हम, हम ही होते हैं, कभी ज्यादा तो कभी कम होते हैं! खुद के खारिज़ हैं अक्सर, क्या शिकवा करें ज़माने से! पुछ रहे हैं अब क्या होगा, अपने ही अफ़साने से! अपने ही शौक़ीन न हो जाएँ, आईने कहीं मेरे यकीं न हो जाएँ! लगे है रोज "Like" गिनने में, ड़र हैं कहीं कमी न हो जाये!

ज़रा

ज़रा सा उनका मुस्कराना है ज़रा सा हमको पास जाना है ज़रा सी भूल हमसे हो ज़रा सा उनको भूल जाना है! ज़रा सी सख्तियाँ उनकी ज़रा सी नाज़ुक मिज़ाजी, ज़रा से बेशरमियाँ मेरी, ज़रा सी हाज़िर-जवाबी ज़रा से रास्ते दिल के ज़रा सा साथ में चल के ज़रा सी उम्मीदें उनकी ज़रा सी मेरी जिद्दें हैं,  ज़रा सी आवारगी में हम, ज़रा से उनके नखरे हैं, ज़रा है साथ ये हरदम,  ज़रा से फ़िर भी बिखरे है ज़रा से अजनबी हम हैं, ज़रा सो वो हैं पहचाने ज़रा सा दूर से देखें ज़रा करीब कब आएं! ज़रा से हम उनके हैं, जरा से वो हमारे हैं, ज़रा सा बह रहे हैं वो ज़रा सा हम किनारे हैं  ज़रा से ज़ख्म उनके भी ज़रा से दर्द हमारे हैं ज़रा सा इश्क ये ऐसा ज़रा से हम बेचारे हैं ज़रा सा मौसम बेइमान ज़रा सी सफ़र कि थकान ज़रा सा हाथ कंधों पे ज़रा सा काम यूँ आसान

तुम भी न!

मुझको मेरे बारे में बतलाते हो, अब मैं क्या बतलाऊँ, तुम भी ना, कम सुनता हूँ ये बड़ी शिकायत है, फिर भी कितना कह देती हो, तुम भी न, इतने सवाल कहाँ से आ जाते हैं, यूँ तो रग-रग से वाकिफ़ हो, तुम भी न, उम्र हो गयी साथ सफ़र, जो जारी है, फिर भी तनहा हो जाती हो तुम भी न गुस्से से, कभी हार और और कभी प्यार से, अच्छा लगता है पास आती हो, तुम भी न, क्या जिस्मानी, क्या रूमानी या रूहानी, तुम फिर भी तुम ही रहती हो, तुम भी न, पूरी दुनिया अपनी है हर एक इंसाँ, फिर सामने तुम आती हो, तुम भी न! फितरत सब की पकड़ने की फितरत ये, मेरी बात मुझे कहती हो, तुम भी न मौसम बदला, बदलेंगे मिज़ाज़ भी, कम ज्यादा होंगे हम, तुम भी न

यूँ अक्सर!

युँ भी कई दिन हम होते हैं, जो काटते हैं वही बोते हैं! यूँ भी हम खाली हाथ होते हैं, न उनके न अपने साथ होते हैं अक्सर ऐसे भी हम खोते हैं, कहने को उनके साथ होते हैं! अक्सर ऐसे भी हालात होते हैं, वो हम नहीं होते जो हम होते हैं, लम्हों के नाज़ुक, कहने को लोहा सही, मौका मिले तो हम भी ज़रा रोते हैं! यूँ होने को ये एक इल्ज़ाम है, जो होते हैं हम काफ़ी नहीं होते, गुनाह कबूल हैं सारे अक्सर, यूँ तो क्या करें‌ काबिले माफ़ी नहीं होते!

मैं और तुम

मैं क्या महसूस कर रहा हूँ  ये महसूस करने की कोशिश सोच रहा हूँ मगर कोई ख्याल नहीं करता तो हूँ बहुत कुछ पर तेरे सवाल नहीं वक़्त वापस नहीं आता कुछ शुरू, कुछ खत्म नहीं होता उस दर्द का क्या करें जिसका जख्म नहीं होता न उम्मीद टूटी है  न एहसास छूटा है न कोई दूरी है फिर भी हर पल       लम्हों की प्यास है मैं तो मुस्कराता रहता हूँ फिर क्या है जो उदास है खाली प्याले...अधूरे निवाले...बिस्तर की सिलवट...  मैं और तुम सच कोई परिभाषा नहीं कोई अतीत नहीं न कोई कोशिश कुछ होने की करने की मैं और तुम सोच से परे गहरे समय से मुक्त मैं कहीं खत्म तुम कहाँ शुरू इंतज़ार अधूरेपन की सम्पूर्णता मैं कहाँ शुरू तुम कहाँ खत्म इस क्षण इस पल सच विचारमुक्त मैं और तुम