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सुबह समझिए!!

सुबह झांकती है हर कोने से, देखिए!  ज़रा उचक अपने बिछौने से, साथ चलने को तैयार, रोशन,  होशयार! अकेले कोई भी नहीं है, अगर आप सिर्फ़ "मैं" नहीं हैं, केवल एक इंसान? इतनी सिमटी पहचान? ढूंढते फिरिए फिर, भीड़ अपनी पहचान, कपड़ों की डिज़ाइन, चेहरे का नक्शा, फेयर व लवली, नॉट सो ईजिली!! जमीन आसमान, जंगल जीव खुला दिल तहज़ीब, फूल पत्ते, मधुमक्खी के छत्ते, गुम होते जानवर, काली होती हवा ? पूछिए खुद से! आप कौन हैं? उस दौड़ की भीड़! जिसकी खो गई रीढ़? या उस दुनिया के अजूबे, जिसमें लाख जीव जंतु दूजे? अकेले अपने लिए, अपने मैं, अपने कुनबे, अपने जात, या ये जगत आप की जात, सब सबके लिए? आप प्राणी हैं या महज़ एक इंसान? अकेले हैं? या सुबह के साथ?

सच सुबह!

सब खुश हैं, अपनी अपनी जगह पर अपनी अपनी जगह से, फ़िलहाल, इस पल में और फिर सब बदल जायेगा और फिर भी सब खुश हैं, अपनी अपनी जगह पर अपनी अपनी जगह से सूरज बादल आसमान जमीं सारा निसर्ग, सब साथ हैं, अपनी अपनी जगह भी, और उस के साथ बदलते न अटके हैं , न भटके हैं न कोई चिन्ता है, न कोई इंसिक्युरिटी, न खींच-तान, न अपनी जगह का दबदबा, पानी पानी, हवा हवा सब चल रहा है, सब बदल रहा है, बदलने की कोशिश नहीं, क्योंकि बदलना ही ज़िन्दगी है, कोशिश तब जब डर हो, अगर मगर हो, खम्बों में घर हो, और ये गुमाँ कि कुछ मेरा है, "मैं" मालिक, कितनी इंसानों जैसी बात है, आप ही कहिए, इंसान होना कौन बड़ी बात है!??

पल पल समंदर

कहाँ से उठी ओ कहाँ जाएगी, ये सुबह, फैलती सिमटती ये जगह, मिलती बिछड़ती कोई वजह भाग रही है, या जाग रही है, नज़र, समा रही है या समेटे हुए, रेत, मिटती है या लिपटती है, लहर, अकेले है या साथ के जश्न की, पहचान, तमाम है, और हर पल तमाम भी, सच यकीं भी है ये और गुमाँ भी, ज़िन्दगी, है? इस पल, और कल?

प्रकृति पुरुस्कृत!

वो एक खुबसुरत सुबह सुरज़ की रोशनी से चमकती , और उसी से पुरस्कृत , पास ही में वो बगीचा ,  रंगों से सराबोर  सारे रंग  जिंदगी के और सब रंग उतने ही उद्धंड़ और घास इतनी घनघोर हरित कि आँख और दिल दोनो भर आयें और उन के पार पहाड़ आशा की ओस में नहाये , एकदम तैयार ताज़गी से चमकते हुए चलने को तैयार कितऩी मनमोहक सुबह हर चीज़ सुंदरता से सृजित संकरे पुल के उपर बहती धारा के बीच जंगल के गलियारे में पत्ते किरणों से चंचलित हो रहे थे चंचलता जो उनकी परछाई को भी रोशनी दे रही थी वो सब साधारण पेड़ थे , पर अपनी हरियाली और ताज़गी से उऩ्होनें उन सब पेड़ों को पीछे छोड़ दिया था , जो नीले आकाश को चुनौती देने में व्यस्त थे ! (जे.कृष्णमूर्ती की चहलकदमी से निकली अभिव्यक्ति को पकड़ने की कोशिश)‌