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कुछ हुआ होगा

हमारे न होने को वो आराम कहते हैं, खामोश हुं तो उसको शाम कहते हैं अपनी परेशानियों को मेरा नाम कहते हैं जिक्र आये तो बस ' ह राम ' कहते हैं हमसे बरबाद होते हैं औरों से आबाद इल्म न था यूँ होंगे यार मेरे हालात किस्मत से यार मेरे रकीब बनते हैं क्या मुश्किल है जो मेरे करीब बनते हैं कहने को तो दोनो खासे शरीफ़ बनते हैं हाथ फ़ैलानें से कहां कोई फ़कीर बनते हैं नज़दीकियों से उनकी मेंरे नसीब बनते हैं दुरियों से उनकी हम गरीब बनते हैं अपने ही इरादों के हम कहां काबिल 'कहने को' दुनिया है, पर 'कहां गालिब' तन्हाइयों के मौसम हैं तन्हाइयों के सवाल मेरा हाल पुछते है , मेरे हालात दिल मे जो है वो ही बयान करते हैं हम कहां लम्हों को सामान करते हैं जो ज़जबात है वही अरमान करते हैं  जिंदगी जो उसी को जान करते हैं हम फ़रमाते हैं उनको लगता है भरमाते हैं हासिल ऐसे लम्हे भी जब वो शर्माते हैं मनमाफ़िक हालात न हो तो गरमाते हैं मेरा मज़हब है जब मेरे करीब आते हैं

तीन करवटें

कुछ नहीं न कोई आवाज़ न कोई अंदाज़ ख़ामोशी भी उदास ऐसा तो नहीं की तुम हो नहीं काम की एक लिस्ट है, कागज बिखरे हैं और बातें अधूरी रातें गुजर रही हैं दिन पलक झपकते मुकर जाते हैं चल रहे हैं पर खबर नहीं दूर जा रहे हैं या पहुँच रहे हैं हिसाब में कमजोर है या हम नज़र ही नहीं आते अकेले कभी गिनतियों में नहीं आते चहेरा देखते हैं या तस्वीर क्यों नहीं है थोडा और करीब? क़दमों के निशाँ मंजिल नहीं हैं गुजरे हैं हम इस से कहाँ इंकार हैं हम उमींदों के फकीर हैं गुजरे लम्हों से आजाद कोशिश तो है आवाज़ आप तक पहुँचती होगी दें तो भला न दे तो क्या खला घूम के फिर आयेंगे खोइये मत हम उम्मीद के फकीर हैं दोनो की पीठ है पर बेरुखी नहीं, न तल्खी, न बेपरवाई,  न रात दिन की भरपाई है,  न दिन रात की कमाई है,  ये बेफ़िकरी के मकाम,  मुसाफ़िरी के अंजाम,  सफ़र में हैं,  हम हमसफ़र हैं!