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बा_रतन

  दाढ़ी–टोपी कत्ल कर मन धीर लिया बनाए, फिर बा को रत्न मिले, सबका मन ललचाए, मन ललचाए गुंडन का सो मुंडन लिए कराए ढाई आखर कत्ल का, किए सो लड्डू खाए! लड्डू खाखा घी के गंगा लिए नहाए, दोष अगर कोई है वो पानी पानी हो जाए! पानी कर दिए खून का इतना उसे बहाए, प्रभुवर आईने देख कर चुल्लू पानी जाएं! पानी पानी हुए जो ताला मुंह पे लगाए, रामराज में बोल दिए तो जेल बुलावा आए! जेल हवा खाए जो भी सीधी रीढ़ दिखाए, दंगाई राजा भौंक के पिरजा भेड़ बनाए!

मनमंदिर!

उम्मीद छोड़ दी पूरी , आज़ाद हो गए! थोड़े थे आज पूरे ही बरबाद हो गए!! गिले - शिकवे सारे बेआवाज़ हो गए! नफ़रत के खिलाड़ी नाबाद हो गए !! अपने से ही अब सारी शिकायतें हैं! अपने इरादों के दगाबाज़ हो गए !! दिल रखना है बस अपना किसी सूरत! गुम अपने से ही सब सरोकार हो गए !! सराब जितने थे आज़ खराब हो गए! कसर नहीं बची हम पूरे मक्कार हो गए! ! मुगालते नहीं कुछ , पूरे तैयार हो गए ! अपने से किए वादों के बेकार हो गए !! तमाम यकीन थे सब फ़रेब निकले! अपनी समझ के हम नाकार हो गए! ! अब क्या खुद को आईने दिखाएं!   अपने अक्स खुद् को नागवार हो गए !! उम्र से कोई शिकायत कभी न थी! आज और थोड़े हम तैयार हो गए !! जश्न के शोर हैं अपनी ही गलियों में! एक और सफ़र के आसार हो गए !! नश्तर जो भी थे सब सवाल हो गए ! जख्म तमाम अब लाइलाज़ हो गए !!

तू जो कहे हाँ तो हाँ!

संजीव भट्ट को जेल नहीं हुई, हम सबको सज़ा मिली है, नज़रबंद, मतबंद हैं अब हम सब, खेलिए अपने खेल, छोटे मोटे,. अपनी गली का शेर बनिए, पर ख़बरदार गब्बरसिंह से पंगा मत लेना! लेना है तो दंगा लीजिए, कैश या उधार, सब स्वीकार, चुनिए किसी अल्पमत को, नहीं पसंद आते सच को लगाइए तोहमत, जपिए राम नाम कीजिए काम तमाम, चिंता की बात नहीं, देर और अंधेर, अब सेर से सवा सेर! कितने अच्छे दिन हैं, चिंता की बात नहीं, कमजोर की अब जात नहीं, और मज़हब की औकात नहीं, विरोध करना मना है, सहमत होइए, शाश्वत सच सब एक हैं, जो भी अंतर है, वो माया है झूठी काया है, यहां से लेकर क्या जाएंगे, चार दिन की बात है, फिर खाली हाथ हैं मरने दीजिए तबरेज़ को, पायल को, अख़लाक़ को, रोहित को, जुनैद को सच को, संविधान को, राम नाम सत्य है, बस यही एक मत है!

शैतानी इंसानियत!!

एक दूसरे की जान लेते हैं, चलिए इंसान पहचान लेते हैं! अपनी ही वहशियत का शिकार है, तशदुद इसका अज़ीज हथियार है! इंसानियत कोई बड़ी कीमती चीज है, शायद इसलिए किसी तिज़ोरी बंद है! कुछ भी नामुमकिन नहीं इंसान को, तबाह कर देना अपने ही नाम को!  अपने गुनाह इतिहास में शान हैं, कोई और करे तो वो हैवान है! हर दौर में इंसानियत की फसल फलती है, उसे हज़म करके हैवानियत पलती है! सियासत कब्रों की खेती है, ज़मुहरियत में भी होती है! मानव ही मानव का शिकारी है, इंसानियत चीज़ बड़ी बेचारी है! ताकत के ज़ोर पर, बेहिसाब लोगों को मार डाला, मनुष्य ने प्राणी कहलाने का, अपना हक़ मार डाला!