इस ज़माने के ये चलन निराले हैं, मर्द सारे गम के गीत गानेवाले हैं? इकारार की इल्तज़ा और जोर, ता-ज़िन्दगीं साथ निभाने वाले हैं? आदम की दुनिया है, समझे हम, हव्वा है हम दिल बहलाने वाले हैं! जो भी निशान हैं हमारे जिस्म पे, कौन अपनी पहचां बताने वाले हैं? रगों में खून है ओ दिल धड़कन है, कौन सुनता किसको सुनाने वाले हैं? बेटी, बहन, बहू, मां, सब जली हैं, हम कब इनके रास्ते आने वाले हैं? दो चार हाथ ही तो मारे हैं, बाद में चांद-तारे लाने वाले हैं! न जमीं, न ही आसमां अपना है कहां इस दुनिया से जाने वाले हैं? बहुत् शरीफ़ हैं वो कैसे भूलाएं उनके एहसान सब गिनाने वाले हैं, हम फ़क्त अपने सपनों के बांझ है, गुड़्डे-गुड़िया खेल पुराने वाले हैं! हमारे अफ़सानों का भी दौर हो, दुनिया से मर्द कब जाने वाले हैं? बात उनकी थी अज्ञात ये तो, कौन किसको बताने वाले हैं? (गज़लों के बारे में सोच रहा था, और गाने वालों के बारे में, ज्यादातर मर्द, अपने दर्द की हंसी दास्तां...
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।