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युँ हो कि !

उड़ो उस सपने की तरह          जो इस धरातल पर पला है बहो उस खुशबू की तरह         जो कुछ मांगती नहीं चलो उस लहर की तरह,         जो जीती है, हर पल के लिये         अंत की तस्वीर आखॊं में लिये  गिरो उस बीज़ की तरह         जो बादल के बरसने और         सुरज के चमकने का कारण बनता है रुको तो ऎसे कि किसी के          चलने का कारण बनो मुस्कराओ, मदमाओ          आंधी में झुमते तरुवर की तरह बहक जाओ भी तो          पैरॊं में अपनी जमीं को लिये पहचान हो अपनी ऐसी कि          कहीं भी खो जाओ बन के नदी सागर को भिगो जाओ!

दिन रात

रात बैठी हे सिऱहाने पर, तुली है आखॊं में आने पर पर जहन मश्कुर है, कैसे बैठे जमाने के पैमाने में सुबह पैरॊं तले सिकुडी पड़ी है, ये घडियों की गुलामी बड़ी है अपनी कौन सी अड़ी है, गुजर जाये जो जल्दी पड़ी है! शाम ऐसे इतरा रही है, जैसे गुजरना ही नहीं है, दिन गया तो रात सही, कुछ करना ही नहीं है. धुंध छाई है, आज रौशनी ही परछाई है, ये कैसी सुबह है, सूरज ने ली अंगडाई है सुबह कि ठंड से जल गया सूरज, मन ठान के फिर चल गया सूरज, ओड़ती चादरॊं ने अहं को आवाज़ दी, चल गयी दुनिया, जल गया सूरज रात के पहलु में बैठे दिन कि बात करते हैं, ठिठुरती दीवारों में ख्यालॊं कि राख करते हैं, ठहरी अंगडाईयॊं को कहाँ कुछ खबर है, यूँ ही हम अक्सर बात करते हैं ! एक दिन की तीन करवट, हर मुश्किल नहीं पर्वत कुछ हलचल है दिल की, कुछ जहन ने की हरकत