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हम काफ़िर!

हम काफ़िर हैं झूठे यकीनों के, दीवारों में चुनने के काबिल हैं क्या? अकीदत और इबादत के गैर हैं हम, आपकी दुआओं से खैर हैं क्या? सजदा करें इतनी अना नहीं हममें,  ख़ाक से पूछिए ख़ाकसार है क्या? अपने गुनाहों को गंगा नहीं करते, जो एहसास न हो वो वजन है क्या? "जय श्री" जोश में कत्ल कर दें कोई आप ऐसे कोई अवतार हैं क्या? भक्त भीड़ बन गए हैं तमाशों की, सारे अकेलों की कहीं भीड़ है क्या? हम मुसाफिर हैं तलाश तख़ल्लुस है, ज़िंदगी मज़हब के वास्ते है क्या?

इस दौर!

लाख़ ढूंढे मिलने वाले नहीं, कितने गिरे हैं कुछ इल्म नहीं! कहने और करने में फर्क जो है, ये फांसले कम होने वाले नहीं! बहुत सर चढ़ाया है तारीखों में, गिरेंगे अब, उतरने वाले नहीं! दुश्मनी जो रास आने लगी है, ये नशे, अब जाने वाले नहीं! जो सामने है वही सारा सच है, ये नया कुछ जानने वाले नहीं! नफरतों ने आबाद किया है, तुम बर्बादी अपनी मानने वाले नहीं! अपने ही हैं जो बहक गए हैं, सब वो अब अपना मानने वाले नहीं! उम्र का तकाज़ा देने वाले सब,  मानते हैं, अब जानने वाले नहीं!

क्या देखा!

सपनों के हक़ीकत बनने कि बात करते हो, हमने अकीदत को यहां खुदा बनते देखा है! खुद में मसरूफ़ होकर महफ़ूज़ नहीं होते, हमने खुदा को भी तो यहां लुटते देखा है! कल जमाना खुशियों पर मगरूर था, आज उसको लकीर पीटते देखा है! वक्त का घोड़ा हम सब पर सवार है, हमने कब वक्त के उस ओर देखा है? देखी तो हमने भी बहुत सारी दुनिया खुली  आंख  सुबह तो कुछ और देखा है! वही मातम अपनों को, परायों की नुमाईश है, अपनों से आगे हमने, कहां कुछ और देखा है? माना ये दुनिया हर तरफ़ लक्ष्मण रेखा है, हमने भी पलट कर कहां‌ खुद को देखा है! नफ़रत की क़ैद में अब सारी आशनाई है, पहले कहाँ इतना कुछ नागवार देखा है? डर ने घर बना लिए हैं कितने ज़हन में, बड़े फ़ायदे का किसीने कारोबार देखा है! शक ही काफ़ी है गुनहगार बनाने को, जहां देखा भीड़ का इंसाफ़ देखा है! इंसाफ़ की कब्र पर मंदिर बनते हैं, इस सदी भी ऐसा रामराज देखा है!

विकास विकासम विकासस्यम!

ये दुनिया,  और हम इंसान,  इसका केंद्र,  सब कुछ हमारे इर्द-गिर्द घूमता है,  क्योंकि हमें आगे बढना है,  सबसे आगे,  हर उंचाई पर चढना है, हमसे बेहतर क्या है?  ये कोरोना क्या है? तमाम ज़ंग हैं,  जिनसे लड़ना है,  भूख, पितृसत्ता, घरेलू हिंसा  देह व्यापार, बाल मज़दुर  और हमने क्या चुना है?  नफ़रत, मज़हब,  फ़ूट डालो और राज करो!  अमन-शांति  सब को जगा देगी,  उन सवालों तक पहुँचा देगी,  जो सच की तलाश में हैं! बादल,  हमारा आसमान हैं,  ऐसा हमारा ज्ञान है  जो सामने आ गया  उस को सच करते हैं,  खोज, तलाश, शोध  विज्ञान, सवाल, सुक्ष्म सोच,  ये सब बेकार बातें हैं  हमारे सच, आजकल  व्हाट्सएप पर आते है और हम उसे,  और दस लोगों तक पहुँचाते हैं,  फ़ॉरवडेड एज़ रिसीवड! एक बीमारी के फ़ेल हैं  घर बैठे जेल हैं  तरक्की के ये खेल हैं  एक वाइरस के बेकार हैं इतने हम लाचार हैं  'कुछ नहीं कर सकते'  ये विशेषज्ञों के उपचार हैं  कोविड 19 की व्यापकता  और गु...

हम सरकार!

टिकटोक पर बैन है! व्हाट्सएप से चैन है? पेटीएम फ़िर कैसा है? पीएम केयर में पैसा है? हाथ धोए पीछे पड़े खासे चिकने घड़े, खोखले भाषण सब, क्या कीजिएगा अब? मुफ़्त में राशन देंगे,                                                                                                                  योगा के आसन देंगे, झुठ आश्वासन देंगे, सवाल न होने देंगे! देश की सरकार है बात ये बेकार है, इंतज़ार करते मदद का, लाखों लाचार हैं! बात बढ-चढ कर बोलना, बीमारी मज़हब से तोल ना नफ़रत को भक्ति बोलना सत्ता के खेल हैं! सरपरस्त लकीर के फ़क़ीर हैं, कहाँ किसी के ज़मीर हैं, खून चूस मज़लूम का कामयाब सब अमीर हैं! ये कैसे हालात हैं,              ...

टूटती सच्चाईयाँ!

पैर ही छा ले बन गए हैं हवा के निवाले बन गए हैं, जुड़े हाथ प्या ले बने हैं अपने मुल्क के निकाले बने हैं! इस मुल्क में  सब कुछ चलता है! जैसे मजदूर हजार  मील ! घर बैठे  टीवी  पर देखने मिलता है! देश को  बेरहमी  से शमशान कर दिया! भुख और मौत  को मुसलमान  कर दिया! नफ़रत  या द्वेष  कहते हैं,  किसने  कहा देश  कहते हैं! नफ़रत है, द्वेष है,  भेड़िए भेड़ों के भेष  हैं, बाकी सब ठीक,  बड़ा  प्यारा अपना दे श है! कोई सर परस्त नहीं,  मुल्क को यतीम हम, दिलासे खो खले निक ले,  सारे यक़ीन कम! दूरियां बनाए रखना पुरानी परंपरा है, बीमार संस्कृति बड़ी काम आ रही है! बीमारी से मुक्ति मिली,  गरीबी से निज़ात,  जात, धर्म पूछें तो  और बिगड़ जाएगी बात!

कोरोना बहके बहकाए!

कहते हैं आपदा बड़ी है, जरुरत सब साथ आएं, हाथ बटाएं, जुगत बिठाएं, कोरोना से बचें-बचाएं,  और फ़िर शुरू तमाशा,  काम की बात गुल,  मार्च अप्रैल फ़ूल- पुरा बीमारी के साथ, बेचारी से मौत डॉक्टर नर्स बिना जरूरी सामान ताली सुन कर चलाओ काम! जो बीत गई सो बात गई, बड़ी रोशन कल की रात गई, जोश जुनून जज़्बात गई, समझ को जैसे लात गई, भुल सब हालात गई, कोरोना को कहते मात गई? सोच भी जल गई, इरादे भी जल गए, फिर रोशनी की आड़ में, अंधेरों से मिल गए, भीड़ में निकल गए! ज़िंदगी जी रही है बंद कमरों में, मौत सड़कों पर मजदूर चर रही है! टीवी पर देखिए आराम से खबरें, नफ़रत आपकी रगों में पसर रही है! बंद हैं सब चारदीवारी में, वो सच जिनको आवाज़ नहीं, मासूम जिनकी परवाज़ नहीं, गालियां, थप्पड़, चीख़, दया की भीख, दस नौ आठ , दस नौ एक (10 दिन के लॉक डाउन में लगभग एक लाख फ़ोन  (1098-चाइल्डलाइन, 1091 महिला हेल्पलाईन) आए,  बच्चों और महिला को हिंसा से बचाने के लिए ) खबर सारी हिंदू भई, कुत्तन सा सोर मचाई, तबलीकी, तबलीकी बोल कान सबई ...

क्या गुनिए, क्या गुनगुनाइए!

गोली मारो कहबे, मूरख सोच के नेता चुनिए सहनशील संस्कृति बीरों की कथनी सुनिए! कथनी के सब बीर, कही अनसुनी करिए, बातों के तीर बचने, चलीं अब बहरा बनिए! बातों के सब तीर, मलहम का कर बनिए फिसली हुई जबान जालिम कहिये-सुनिए कहिये-सुनिए सबकी, पर यूँ ना गुनिये काँटों का, का दोस् ,जीवन आप जो बुनिए? बुनिए जीवन ऐसा जिसमें जगह हो सारी, मैं, मेरा, मुझसे की न लगने पाए बीमारी! लगे बीमारी ऐसी तो पूरी उमर सताए, अपनी ही तस्वीर सजाने तू वक्त गवाए! वक्त गवाएं सारा के बने गोरा-सुंदर क्रीम बेचते मदारी बने कौन है बंदर? बंदर बने बली के, हैं छुरी में धार लगाते, मुंह में इनके राम, पीठ पर छुरी चलाते! छुरी पीठ पर जैसे बनी सरकारी नीति, मिट्टी पैरों के नीचे के बनी है रेती! रेत बन गए सपने सब हाथों से छूटे? टूट गए हैं कितने, कितने खुद से झूठे! खुद से झूठ बोल रहे उनको क्या समझाएं, कहाँ आगयी दुनिया और कहाँ अब जाए?

उमर राव देशजान!?

दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए, ख़बरदार जो मुझ से मेरा हिंदुस्तान लीजिए! देशद्रोही हैं जो करते हैं एनआरसी की बात, क्यों गरीब जान को हलकान कीजिए? कागज़ की बात करते निकम्मे हैं हुक्मरान आता है काम तो नौकरी तमाम कीजिए!! बढ़ रही हैं नफरतें और जा रहीं हैं जान, कैसे रिश्तों को अपने इंसान कीजिए? कितने मतलबी हो करते हो नौकरी की बात, करते हैं खुदकशी खुद को भी किसान कीजिए!! कहने से कोई नहीं हो जाता देश का कागज़ भी कोइसा कैसे मान लीजिए!! दीवार-ओ-दर को गौर से पहचान लीजिए, देश में क्या औकात गरीब की जान लीजिए! #wall build to conceal slum from Trump   बिगुल के सामने  बजाना है..शहनाई, अपना ढिंढोरा पीटने का बस काम कीजिए!

हिम्मत के हथियार!

हिम्मत के हथियार चाहिए नफरत नहीं प्यार चाहिए अपने हाथों में हो अपनी कश्ती की पतवार , हिम्मत के हथिया र, हिम्मत के हथियार.... कौन कहे किस को बेगाना , मजहब किसने समझा जाना मंदिर मस्जिद की बातों में, नफरत से इंकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... कब तक हम बर्दाश्त करेंगे, मासूमों पर वार सहेंगे दिल में अपने प्यार जगा दे, अब ऐसी ललकार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... अपने सबको ही प्यारे हैं , बीच में कौन से दीवारें हैं गुलशन हरसू फूल खिला दें, ऐसे कारोबार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको सबका साथ चाहिए, हर झगडे की मात चाहिए नेक इरादों के मौसम से, ये दुनिया आबाद हिम्मत के हथियार , हिम्मत के हथियार.... सबके दिल में आस चाहिए , उमींदों की प्यास चाहिये मौसम बदलेंगे जब बदलें, मौसम के आसार हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हक की सारी बात चाहिए नहीं कोई खैरात चाहिए, चलिए बनें संविधान के ऐसे पहरेदार, हिम्मत के हथियार, हिम्मत के हथियार.... हमको खबर ए यार चाहिए दोस्ती भाईचार चाहिए रि...

मनमंदिर!

उम्मीद छोड़ दी पूरी , आज़ाद हो गए! थोड़े थे आज पूरे ही बरबाद हो गए!! गिले - शिकवे सारे बेआवाज़ हो गए! नफ़रत के खिलाड़ी नाबाद हो गए !! अपने से ही अब सारी शिकायतें हैं! अपने इरादों के दगाबाज़ हो गए !! दिल रखना है बस अपना किसी सूरत! गुम अपने से ही सब सरोकार हो गए !! सराब जितने थे आज़ खराब हो गए! कसर नहीं बची हम पूरे मक्कार हो गए! ! मुगालते नहीं कुछ , पूरे तैयार हो गए ! अपने से किए वादों के बेकार हो गए !! तमाम यकीन थे सब फ़रेब निकले! अपनी समझ के हम नाकार हो गए! ! अब क्या खुद को आईने दिखाएं!   अपने अक्स खुद् को नागवार हो गए !! उम्र से कोई शिकायत कभी न थी! आज और थोड़े हम तैयार हो गए !! जश्न के शोर हैं अपनी ही गलियों में! एक और सफ़र के आसार हो गए !! नश्तर जो भी थे सब सवाल हो गए ! जख्म तमाम अब लाइलाज़ हो गए !!