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बादल अनलिमटेड़!

बादल , पागल , चले ज़मीन आसमान एक करने खाई का फ़रक लगे भरने , बेअक्ल या बेलगाम , सुरज की रोशनी को मुँह चिढाते , इतराते , इठलाते , भरमाते , नरमाते , पल - पल उम्मीदों को अजमाते , खड़े रहो कंचनजंघा अहम के साथ इस भरम में कि उंचाई विजय है , और बस एक छोटा सा टुकड़ा , जिसे न अहम है न वहम खोते - खोते होता हुआ , या फ़िर होते - होते खोता हुआ , आपकी झूठी सच्चाईयों को गह लेता है , दो पल के लिये ही सही , मोक्ष - एक पल का ही एहसास है , क्या आपके पास खालिस विश्वास है ?

नेल्सन मंड़ेला!

मुझ को ढकी हुई रात के परे , छोर से छोर , काली स्याह , शुक्रगुजार , मैं कुदरती ताकत का , अपनी अपराजित रुह के लिये बिगड़े हालात के चंगुल में , मेरे माथे पे शिकन न गले में रुदन मौकों की मार , मेरे सर को लाल कर दी , झुका न सकी , तमाम नाराज़गी और आँसुओं के परे हावी होते हैं पर परछाई के डर , फ़िर भी , इकट्ठे सालों की धमकी , के सामने मैं हूँ और रहूँगा निड़र , नहीं‌ पड़ता फ़रक कि रास्ता कितना तंग है ,  और क्या जारी हुए फ़रमानों के ढंग हैं , मैं ही अपनी किस्मत का विधाता हूँ ,  मैं ही अपनी रुह का ( कार्य ) करता हूँ ! (ये उस कविता को भाषांतरित करने की कोशिश है, जिसकी पंक्तियों‌ ने नेल्सन मंड़ेला को २५ साल जेल में अपने सच के साथ रहने की ताकत दी, अपनी रोज़मर्रा की मुश्किलों या यूँ कहिये अपनी असंभावनाओं को अपने पर हावी न होने देने की कल्पना!)‌

बेदखल !

अपने ही घर से निकाले गए कहता है अब तक पाले गए जैसा था सांचा ढाले गए हम कहाँ वक्त के हवाले गए  झूट के जाल में जाले गए हर सच पर अपने सवाले गए अपने हाथों के निवाले गए उनके हाथों में प्याले गए कैसे ये आँखों को जाले गए सारे उसूलों को लाले गए रस्ता दिखे यूँ उजाले किये उसने दरवाजों को ताले किये [कई कई साल पहले, लोगों के छोटे दिल और सिकुड़े हुए दिमाग से प्रभावित होकर रचित]