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इंसानी विधाएं!

दुनिया बहुत भरमाए है,  तस्वीर मन लुभाए है,  मन बहुत बहकाए है,  जिम्मेदार कौन हो? इंसान अब भी मूरख है,  नीयत से धूरत है,  काट, छाँट, बाँट,  ये तरक्की की सूरत है! मौत के डर से ज़िंदगी निचोड़ते हैं,  सारा रस निकालने को,  लाश बनने को,  कहां कोइ कसर छोड़ते हैं! काबिल हैं तमाम बातों के,  लिख्खा है सौ किताबों में,  समझ को बदल ताकत में,  बने लातों के भूत बातों से!  दूर दूर तक के सफ़र हैं,  मुमकिन सोच के असर हैं,  फ़िर क्यों 'मैं मानव' में सिमटे हैं?  किस सवाल के कम हैं? हर शुरुवात मोहब्बत है,  फ़िर रिश्ता बनती है,  फ़िर सौदे की बातें सब,  ये रास्ते दुनिया चुनती है! दर्द जो हमारे हैं,  बडे ही हमको प्यारे हैं,  लाखों कत्ल कर कुदरत के,  कहते, 'वाह!क्या नज़ारे हैं'! फ़िर भी ये नहीं के हम इंसान कम हैं,  या नेक होने को अरमान कम हैं,  पर अपनों से ही सारी लडाई है,  उधडें वही जो बुनाई है, बनाई है!

क्या जानें, कौन माने!!

जो आंखें देखती हैं, वही आंखें दिखती हैं! बात किस की है? ये सवाल किसका है? ये हाल किसका है? यूँ मलाल किसका है? जो देख रहा है, उसे देखते हैं! सच, अलग अलग देखते हैं! एक ही बात कहाँ है, इतना बड़ा जहां हैं? आप कहाँ पहुंचे, और वो रास्ता कहाँ है? मुसाफ़िर कई हों, रास्ते पर, पर सफ़र एक नहीं, असर? अंजाम? नज़र देखती है, नज़रिये से, ये ही ज़रिया है, आपका क्या? कहाँ पहुँचे हैं? पहुँचना कहाँ हैं? किस बात से तय? ओ तय बात क्या है? हूँऊं, ओह, क्या, वाह, अच्छा, शायद, याने, हज़ार ख़याल मन में, क्या जानें, कौन मानें?

जाओ भरसाई में ......

उनका शहर देख लिया, दोपहर देख लिया, रोशनी वहां भी है, अँधेरे भी होंगे, गुम होने को कई कोने भी होंगे, अँधेरे यहाँ भी बहुत हैं, पर गुम नहीं हो सकते, सच्चाईयां सर सवार हैं, और भीड़ ज्यादा है, कंधे रगड़ रहे हैं,  कब किस की मुश्किल अपने कंधे आ जाये और वहां खामोशी कितनी है, चाहें तो  अपने ही ख़्वाब सर चढ़ बोलते हैं, और यहाँ बारिश हो तो आँखे गीली करते हैं, मुल्क है कोई और  या जैसे मुरख को आइरनी(IRONY)  समझाने  कसर न रहे ये सोच थी? सड़कों पर जगह बहुत है  लोग कम पड़ जाते हैं, पुराने शहरों को चमका के रखा है,  इतिहास किताबों में होता है सुना था, काम चार दिन होता है  और दिन छोटे?  जाहिर सवाल है, इन लोगों को कोई काम नहीं? और दवाइयां भी मुफ्त, पता नही सब बीमार क्यों नहीं पड़ते...? हमारे यहाँ बांटो,  भले-चंगे लाईन में नज़र आयेंगे, दवाई दावतों में खिलाएंगे, अज़ीब दुनिया है, कहीं समंदर है आराम, और कहीं जीना हराम, चक्रवात तूफ़ान शायद किसी पागल ने बनाई है, अब क्या बोलें जाओ भरसाई में !

जो है सो है! हाँ नहीं तो!!!!

क्योँ आसमानी बुलंदी पर नज़र है, गर आपके इरादॊं में जिगर है? क्या इरादे आसमान चाहिये, या बस इसाँ आसान चाहिये? एक काबिल अंदाज़ चाहिये या सर कोई ताज़ चाहिये?  सामने सफ़र है पीछे घर है, काहे को पुकार चाहिये?  तमाम सलाहियतें और खुब कमियां नज़र जरा नज़रअंदाज़ चाहिये युँ ही दुरियाँ कम नहीं‌ होतीं (जमीं आसमान की)‌ पलकें थोड़ी सी नम चाहिये! झोली भरने को नहीं, संभलने को है फ़कीरी में क्यॊं गोदाम चाहिये? जो मिला है वो काफ़ी हो, काहे किसी को राम चाहिये?