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मुकम्मलियत मुबारक!

हम भी आतंकी हैं हम भी खूंखार हैं, भयंकर हैं हम, हम भूत सर सवार हैं! कातिल हैं हम, वहशी भी अपरंपार हैं, हम ही शैतान हैं, हम कहां खबरदार हैं! हम छप्पन नहीं बस, हम पैंसठ साठ हैं, सत्तर पचहत्तर हैं हम नंबरदार हैं!! बड़े काम के हैं हम जब हम बेकार हैं, बोझ हैं जमीन पर, मिट्टी के गुनहगार हैं! हम ही बंदूक हैं, टैंक हैं, उड़ती मिसाइल हैं, आने वाली पीढ़ी को बड़ी घटिया मिसाल हैं! हम भगवान भी हैं, हम ही अपने निजाम हैं, हम से गलती नहीं होती, निष्कल आवाम हैं!

तमाम नफरत....तमाम!

जो नेक है उसका ध्यान करते हैं, चलिए यूँ नफ़रत तमाम करते हैं!! दोनों तरफ हैं लोग जो मुस्कराते हैं, ऐसे भी क्यों जी हलकान करते हैं! इरादों की जंग है अमनपसंद रहिए! क्यों कम अपनी मुस्कान करते हैं!! जो शिकारी बन गए वो भी शिकार हैं, क्यों उनकी नफरत एहतराम करते हैं! ज़ख्म, जज़बातों की नज़र न आ जाएं, और आईने को अपना मकाम करते हैं! वो तमाम जो बदले की बात करते हैं! सब अपने घर बैठ कर आराम करते हैं!! झूठ खबरों ने आँखों को पर्दा किया है, ग़ुमराह हैं जो, सुना उसे ज्ञान करते हैं!! मिटा दो, ख़त्म करो, विनाश, ये युद्द्घोष ये भक्त खुद को क्यों भगवान करते हैं?

जुनैद की टोपी का कत्ल!

बस एक टोपी ही मुसलमान थी, उसके नीचे तो मैं पूरा इंसान था? क्या देखा आपने के मेरा इंसान तो दिखा नहीं, अपनी इंसानियत भी नज़र नहीं आयी? आपके ज़हन ने कैसी मेरी तस्वीर बनाई? वो आपकी आँखों का सुर्ख रंग, मेरा बिखरा हुआ खून कैसे बन गया? क्या बात हुई आपके दिल और दिमाग में? पहली बार कत्ल किया या, है ये आपके मिज़ाज़ में? आप भीड़ थे या  उस नफ़रत की रीढ़ थे? मैं समझ नहीं पाया यूँ पूछता हूँ? मुझे तो आपका इंसान नज़र आया, मैंने हाथ जोड़ कर ये इरादा फ़रमाया, पर माहौल इतना क्यों गरमाया? क्यों इतनों का इरादा भरमाया? क्या आपने नफ़रत पाली है? इतनी फल-फूल कैसे गयी? ये कैसी आँखों में धूल गयी? और आप कहते हैं आपने हाथ नहीं उठाया? और आवाज़? आपकी खामोशी मासूम थी? या डरी हुई? या अपनी ही नज़रों से गिरी हुई? गलत हो रहा है? आपको एहसास था? क्या ख़ाक था? बस एक आख़िरी सवाल है, मैं तो मुसलमान था फिर, मेरे कत्ल से भी "राम नाम सत्य" हुआ क्या? चलिए आपको आपका सच मुबारक हो!

गुस्सा सवालिए!

मैं उदास हुँ हताश नहीं, गुस्सा पाल नहीं रहा, सवाल रहा हूँ, मैं हाल हूँ या हालात? खबरों में खुद से होतीं नहीं मुलाकात, नफ़रत का हर तरफ़ बवाल, कोई मज़हब जल रहा है, और कोई धर्म जला रहा है! जो ज्यादा है वो भीड़ हैं, जो कम हैं वो कम पड़ रहे हैं! इंसान अब इंसानियत से लड़ रहे हैं! और वातानुकूलित सच वालों को यकीन है, के इस दौर में हम आगे बढ़ रहे हैं!