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बेटी - बचाओ बचाओ!

वो सब राम के बंदे थे, मजबूर थे की नीयत के नंगे थे! परंपराओं के पक्के थे, कुछ अधेड़ थे कुछ उम्र के कच्चे थे, पर इरादों के अपने पक्के थे, दिल थोड़ा नाज़्ज़ुक था, बच्ची पर आ गया, पर फिर भी इरादों से नहीं डगमगाए, बच्ची को मुश्किल न हो, इसलिए दवा भी दिलाए, मारने के बाद भी उसके कपड़े धुलाए, और इस सब में भी पूजा पाठ, भक्ति की पराकाष्ठा कहिए, संतो की वाणी है, अच्छे-बुरे में एक समान, देवस्थान! जय श्री राम! नहीं पड़ेगा जो हनुमान चालीसा, उसका होगा काम तमाम! भारत माता की जय, वंदे मातरम, डर किसका है! (इस्तेमाल किए गए व्यंग चित्र भगवान का अपमान नहीं करते, न ही ऐसी मेरी कोई मंशा है, वो इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि भगवान के नाम का कैसा गलत इस्तेमाल हो रहा है)

रामलछन

राम नाम के काम सब, राम नाम के लच्छन, इज्ज़त से सब खेल रहे राम जपन के बंदर, राम जपन के बंदर सारे बने दुषासन, लाल किले पर चढ़के ये देते भाषण, भाषण के बड़े बीर लगाबें झूठे नारे, संविधान पर बैठ जोर से राम जपारे, जप के ज़ोर से राम राम मस्ज़िद दिए गिराये, नफ़रत के सौदागर अब देस अपना चलायें, देस अपना चलायें राम के सारे जादे, बेच दिए पूरी देसवासी अक्ल के आधे, अक्ल के आधे राम को सारे अंधे, मज़हब के चल रहे तमाम धंधे अंधे, धंधे-अंधे चला रहे माया  का जादू, चला रहे सत्ता अंबानी-अडानी के बाबू अंबडानी के बाबू सब देस को सेब बनायें, बेचेंगे ये मुलक कोई जो जेब गरमाए, गरम जेब के लालच में देसभगत सब आये लालच की भक्ती में सारे राम-लुभाये! रामलुभाये आसा, देव, और श्री के संकर, फूल चढ़ाये बहुत कोई अब फैंको कंकर!

कितने सच?

क्या सच आजाद होते हैं?  अकेले? अपने आप में पूर्ण? आत्मनिर्भर दो सच जब साथ आते हैं तो सामने होते हैं या बगल में इंसान जब सामने आते है तो नागासाकी पहुँच जाते हैं, अगर आप कहते हैं दुनिया सुन्दर है तो आप शायद बन्दर हैं टुकुर टुकुर देखते, पैरों पर खड़ा होना सीख गए पर ध्यान शायद अब भी उस आम में अटका है जिसकी गुठली के दाम नहीं होते दुनिया चीख कर कह रही है "ये आदमी किसी काम का नहीं" पर आप कान नहीं होते! अगर आप रामभरोसे हैं तो याद कीजिये? सीता का हश्र मर्यादा या मर्द आधा आज का सच विकास है! गला तर, पेट भर प्यासे के भूख कि किस को खबर किसके नज़र ऊँचे मकानों में मौत भी दावत है ओर जिनको छत नहीं उनकी ये आदत है अमीर ओर अमीर, गरीब ओर गरीब ये अब एक कहावत है, किवदंती, क्या सोचें उनको जिनकी पहचान है सिर्फ गिनती, ८०% प्रतिशत, २० रूपये रोज, " सच " कहते है बड़ा बलवान पर उसकी तो सुपारी दे दी है, सर उठाओ सामने है पहलवान, और आज कि द्रौपदी के भी वही हाल है साडी जितनी कम, बाज़ार उतना गर्म, पापी पेट का सवाल है ...

गुठली के दाम!

राम का नाम, मासूमों की जान, सियासत तमाम, शरीफ़ों की ख़ामोशी,  समझदारों की तकरीर, ज़ाहिल तालीम, और तजुर्बों की ज़हालत, बेड़ा-गर्क है मियाँ और इरादों की वकालत? धोका खाने का उतना गम नहीं जो इस एहसास का, कि हम आदमी आम निकले! भगवान के नाम पर दे दो अपने वोट! सियासत में भिखारी तमाम निकले!! जितने थे सरपरस्त सब हराम निकले!  कोई नहीं जिसके मुंह 'हे राम' निकले !! सियासी दंगलो के अब नए सामान निकले!  कहीं राम निकले तो कहीं कुरान निकले!!  भक्तों ने तेरे तुझे ही गलत साबित किया!  छुरा भोंक कर देखा, कहाँ पर राम निकले!! जिसने खुदा का नाम बदला उसको मारा! हे भगवन, तेरे भक्त बड़े  शैतान निकले!!  जरुरत पड़ गयी तो दोस्ती का वास्ता! फिर मिलेंगे जब कोई काम निकले !! साथ है, तो हाथ तुमको, क्यों कर जरुरी है! कोई सौदा है आम, कि गुठली के दाम निकले? कोई नयी बात नहीं, तरह तरह के राम निकले! हर युग में सीता की बस यूँ ही जान निकले!! (मंदिर मस्जिद के प्रेमी व्यापारिओं से परेशां हो कर  बाबरी कांड और उसके बाद...