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जी हुज़ूर!

हुजूर भी हैं हम जीहुजूर भी हैं, पास हैं चाहे कितने दूर भी हैं! मंजूर भी हैं, नामंजूर भी हैं, अपनी खुशी से मजबूर भी हैं! कमजोर भी हैं और शूर भी हैं, बदलते लम्हों के मशकूर भी हैं! काबिल हैं दोनों अपने आप के, जरूरत नहीं फिर जरूर भी हैं! बेअदबी के कायल हैं दोनों, अपनी गुस्ताख़ी के शु'ऊर भी हैं! मलहम हैं तो नासूर भी हैं, इंसाँ हैं मखमली काफ़ूर नहीं हैं! शराफ़त नहीं है इस रिश्ते में, आम हैं हम खजूर नहीं हैं! मंज़िल नहीं रास्ते हैं रिश्ते, हमसफर हैं जन्नत जरूर नहीं हैं! साथ है यही मुकम्मल बात है, करवा की मंगल सूत्र नहीं है! बनी है वही बात जो बिगड़ी है, जेहन का क्या जज़्बात नहीं हैं?

कशमकश कश्मीरियाँ

  Kashmir

समंदर अहंकार!

साहिल डूब रहे हैं अपने ही समंदर से, और सर चढ़े समंदर को शऊर कहां? बिखर कर खो जाओगे समंदर, इल्म है? बूंद से सीखो ऐसी तुमको नज़र कहां? भूल कर शुरुवात, अंत को इतराते हैं? मील के पत्थर हो तुम, मुसाफिर कहां? पहाड़ों को जज़्ब करके अट्टहास क्यों? वही बन गए जिसको तुम गिराते हो? एक ही रंग में भिगो दिया सबको? मुरख! अपनी ही पहचान गंवाते हो? वो बाबरी थी ओ तुम भी बावरे निकले? कट्टरता कहते थे (जिसको) वही दिखाते हो

अपनापन!

हम  उन्हीं आवाज़ों से बात करते हैं , जिन्हें हम खुद सुन सकते हैं , और काया बोलती है , और वो बात करती है , सिर्फ़ , उस देह - ए - दुनिया से , जो उसकी पकड़ में है। और वो अपने आप में एक जहां हो जाती है , गौर करके , कि उसका सरोकार क्या है और ये सीखती है , कि उसे क्या होना है , और क्या लाज़मी है! (डेविड व्हाईट की द  विंटर ऑफ़ लिसनिंग से) From  The Winter of Listening by David Whyte in  The House of Belonging

कायकू?

चलता है वही, जो चलता है, किसका क्या जाता है? बादल सच हुए, बरस बरस के, तरसे तर हो गए! सिसकते पहाड़, मिट्टी पत्थर सरकते, आएं किसके रास्ते? कितना ऊपर पहुंचे, तरक्की तमाम, नीचे गिरें धड़ाम! सभ्यता में जानवर, पालतू, आवारा, जंगल,जंगली नागवारा!! हाइवे लंबे लंबे, दूरियाँ कम करते, गांव के बीच से! रोडोडोन्द्रों (बुरांश) फूल, पैसा वसूल, जो जैसा जहां है! छुप रहे हैं सब? बादल, आसमाँ, पेड़! नज़र या नज़रिया? ठंडा गरम सूरज नरम तुम हम! लंबी चढ़ाई, घुटनों से लड़ाई, खुद पीठ थपथपाई!