सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

बलात्कार लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्यार बीमार, चलो जाने दो!

तुम्हारी भी कुछ कमियां हैं, मेरी भी कुछ खामी है, मेरी मार मुझे पहचान न दो अपने प्यार के बीच ,  दो झापड़ न आने दो चलो जाने दो,  मैंनें मारा, मैंनें माना, मेरा प्यार भी, तुमने जाना, मैंनें माना मैं बदलूंगा, मेरी कोशिश जारी है, आज फिर हाथ फिसल गए, अपने प्यार के बीच ,  दो झापड़ न आने दो चलो जाने दो, मैंने धमकी दी, अंजाने में, मारा तुमको, आवेश में,  वो गुस्सा था मेरे भेष में, जानती तो हो अब मान जाओ, चलो साथ अपने मकान आओ अपने प्यार के बीच , दो झापड़ न आने दो चलो जाने दो,  क्यों दूसरे से बात की, (2झापड़) बदन की क्यों नुमाइश की? (स्लीवलैस?) (दो घूंसे) क्यों मेरे सिवा कोई जरूरी है? (दे लात) ये हाथ में क्या ग्लास है? क्यों और कोई प्यास है? क्यों कोई और आस है? मेरा प्यार तुमसे मांगता है, ये दो एक छोटी बात है! क्यों इस पर कोई सवाल है? क्या यही तुम्हारा प्यार है? और शिकायत ये क्यों मार है? अपने प्यार के बीच , दो झापड़ न आने दो चलो जाने दो, सुनो मेरी भी आह को, जो टूटा हूँ, इस चाह को, क्या तुम नहीं मुझे ज...

अरे!बाबा और 40 रेप!

एक समय की बात है, एक देश में रेप रहता था, कभी कभी, दबे पाँव, चुपके से, अंधेरे में, मौका ताड़ कर वो हो जाया करता था, उसको लोगों ने अलग अलग नाम दिए, कभी चीर हरण कहा, कभी गुरु का प्रसाद कभी बनवास, सब को लगा,  चलो कभी कभी हो जाता है, जाने दो! रेप ने भी बड़ी मेहनत की, उसने इज़्ज़त के धंदे में पैसे लगा दिए, बस फिर क्या था, बाज़ार गर्म होने लगा, लड़ाइयों में लोग रेप को मिसाइल बना लिए, रेप को फ़िर समझ आया, ताक़त के खेल में उसका भविष्य है, और वो जान गया कि मर्द सामाजिक विज्ञान का फेल है! बस उसने मर्दानगी के साथ MOU साइन कर लिया जब कभी किसी को कम पड़े, बस रेप से वो और मजबूत मर्द बने! बस फिर क्या था, घर घर में, गाँव शहर में, धर्म जात, अमीर गरीब, हर जगह रेप का बोलबाला हुआ, मरदानगी का ये ख़ास निवाला हुआ। बस में, हस्पताल में, चॉल में मॉल में, जेल में जंगल में, बालिका मंगल में.... रेप सर्वशक्तिमान, सर्वदर्शी, सर्वज्ञानी, सर्वभूत है, यानी रेप हमारे नए भगवान हैं इनके सामने बच्ची-माता सब 'सामान' हैं, क्षमा कीजिए!! 'समान' हैं चलिए रेप...

हमारे विकल्प

बहुत विवाद है? मुश्किल में हैं? चिंता, शंका आपके दिल में है? जिनको बोलना चाहिए  वो चूहे से बिल में हैं! किसकी सुनें, किसकी मानें, लाठी अपनी किस पर ठानें? काहे के मर्द, कैसे मूछें तानें? बतलाए कोई, क्या करें बहाने? चिंता न करें आपके पास कई विकल्प हैं! चुनिए! विवेक से गुनिए, अंधभक्त सा न बनिए!  (a) मंदिर रेप करने के लिए हैं  (इतिहास गवाह है, देवदासियों की कसम) (b) मंदिर में भगवान नहीं होते (बाउंसर होते हैं जिनको पूजारी कहते) (c) रेप में भगवान शामिल थे  (आप लेफ्टिस्ट, देशद्रोही, हिंदू विरोधी हैं, जान बचानी है तो भागिए) (d) पूजापाठ से रेप का अपराध माफ़ होता है  (ये विकल्प चुनने से आप को "योगिश्री की उपाधी मिलेगी) (e) रेप हुआ ही नहीं  (ये ऑप्शन चुनने पर बीजेपी की आजीवन सदस्यता मुफ्त) (f) लड़की मुसलमान थी  (इस ऑप्शन के साथ आपको बीजेपी, आरएसएस, विहिप की सदस्यता मुफ्त) (g) भारत माता की जय   ( ये ऑप्शन अगर आपने चूना तो मर्दानगी का इलाज कराने के लिए हकीम साहनी से मिलें, पता - लखनऊ स्टेशन के रास्ते ...

बेटी - बचाओ बचाओ!

वो सब राम के बंदे थे, मजबूर थे की नीयत के नंगे थे! परंपराओं के पक्के थे, कुछ अधेड़ थे कुछ उम्र के कच्चे थे, पर इरादों के अपने पक्के थे, दिल थोड़ा नाज़्ज़ुक था, बच्ची पर आ गया, पर फिर भी इरादों से नहीं डगमगाए, बच्ची को मुश्किल न हो, इसलिए दवा भी दिलाए, मारने के बाद भी उसके कपड़े धुलाए, और इस सब में भी पूजा पाठ, भक्ति की पराकाष्ठा कहिए, संतो की वाणी है, अच्छे-बुरे में एक समान, देवस्थान! जय श्री राम! नहीं पड़ेगा जो हनुमान चालीसा, उसका होगा काम तमाम! भारत माता की जय, वंदे मातरम, डर किसका है! (इस्तेमाल किए गए व्यंग चित्र भगवान का अपमान नहीं करते, न ही ऐसी मेरी कोई मंशा है, वो इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि भगवान के नाम का कैसा गलत इस्तेमाल हो रहा है)

करवा...कैसे नहीं करबा?

शान है, अभिमान है, इतिहास गौरव और सम्प्रदाय महान है? औरत जननी भी है, और वही बदनाम भी, सीता, राम से महान है, वरना गले न उतरता पान है, द्रोपदी को पाँच से आंच नहीं, सौ से उसकी जाँच है? मतलब जब तक घर की बात है औरत, गद्दे के उपर की बस एक चादर है, पर घर के बाहर हाथ मत लगाना, गुस्सा है या झूठे ज़ज्बात हैं? जयललिता, हो माया हो, या राबरी, सब पर औरत होने का तंज है गंजे, तोंदू, छप्पनी, व्यसनी, मर्दों का कुछ नहीं, सब को भरोसा है, क्रवाचौथ की दुआ पे नहीं, करवाचौथ की सत्ता पर, कि ये एक निशानी है, दुनिया वही पुरानी है, तरक्की, आज़ादी, बराबरी ये बात सब बेमानी है! आखिर झुक कर पैरों आनी है, "अपनी मर्ज़ी से", करती हैं मर्ज़ी के दर्ज़ी कहते हैं! वोही मर्ज़ी, जो उन्हें जलाती है? मारती फ़िर फ़ुसलाती है? सड़क पर बेचारा करती है? और समाज मे लाचारा! गर्भ में नागवारा करती है? शादी के बाद जिसकी 'न' का वूज़ूद नहीं, उसकी "हां" क्या है? मजबूरी गवाह नहीं है, जीहुज़ूरी करिये चाँद के ज़रिये हर पतिता को पति मुबारक हों!

हम साथ साथ हैं!

सुना है  भगवान का बलात्कार हो गया , कहने को दो मर्द थे , बेरहम , बेदर्द थे , भगवान ? हाँ जी , आप ही तो कहते हैं बच्चे भगवान का रुप हैं ,  किससे कहते अब तो भगवान बचाये ? पर सच समझना है तो , सच्चाई जानना होगी , दो मर्द दुकेले कैसे भगवान का रेप करेंगे ? सुसाईड़ मिशन तो था नहीं , वरना बात एक हफ़्ते दफ़न नहीं होती , सच्चाई ये है कि वो अकेले नहीं थे , वो उस समय अपनी जात , जी हाँ , जात जता रहे थे , " मर्द जात " बदजात ! बलात्कार एक हथियार है , उसको बनाने वाले , चलाने वाले , सब मर्द , बलात्कार कोई अकेले नहीं करता , करते वक्त उनके साथ , होती है एक संस्कॄति , चीरहरण की , इतिहास , जंग का , दंगों का , बेगुनाह छूटे साथियों का , हमारी याद , जो केवल अगली बड़ी खबर तक जिंदा है ,  तो अगर आप दोष दे रहे हैं , एक - दो मर्द को , और मांग रहे हैं , उनको सज़ा - ए - मौत तो आप केवल बचने की कोशिश कर रहे हैं ,  सज़ा आप को भी बनती है , हम सब को ,...

बल - बला - बलात्कार!

कौन सा सपना साकार होता है, एक और बला का बलात्कार होता है, चलो बला टली,  एक सबला को अबला किस ने. किस से, किस का, लिया बदला? नयी कोई बात नहीं, सदियॊं का ये सिलसिला, मर्द आखिर है मनचला, जब मन मचला पैर फ़िसला, किसी को कुचला सीटी मारने से लड़की पलट जाती है, थोड़ा छेड़ा तो अमुमन पट जाती है, शर्मा गयी होगी जो रस्ते से हट जाती है, थोड़ा एसिड़(Acid) और निपट जाती है! भीड़ में मौका देख सट जाते हैं, बस के धक्के पर लिपट जाते हैं, हाथ की सफ़ाई है चिमट जाते हैं, अकेले पड़ गये तो सटक जाते हैं  गली में थूका हुआ पान है, घर में रोटी और नान है, बाजार में 'ओये मेरी जान!' है, आखिर गंगा में स्नान है!  एसा क्या उखाड़ दिये, बेटी तीसरी थी सो जिंदा गाड़ दिये, बीबी मेरी है, दो हाथ झाड़ दिये, दुश्मन की, सो कपड़े फ़ाड़ दिये! प्यार में थोड़ी छेड़-छाड़,  थोड़ी जबरदस्ती जायज़ है,  बलात्कारी सभ्यता में,  क्या ये  मान्यता वायज़ है?

मर्द के दर्द!

कौन कहता मर्दों को दर्द नहीं होता , हम बस बयाँ नहीं करते , पैरों के बीच , ... वो . . . मतलब . . . यानि . . . न न ,  दिल में छुपा रखते हैं , खुद ही दारु - दवा करते हैं , थोड़े अंधेरों को हवा करते हैं , पर क्या करें ये खुजली कि बीमारी है , आप तो समझते ही होंगे , ( मतलब देखेते ही होंगे ) क्या करें कंट्रोल ही नहीं होती , और लातों के भूत , हाथों से नहीं मानते , अब आप को समझना चाहिये न . . . सामने क्यों आते हैं , सदियों से यही होता आया है , पेड़ , पहाड़ और औरत , इन पर चढ कर ही हम मर्द होते हैं , ये मत समझिये हमें दर्द नहीं‌ होता , अब हम तो मानते हैं , हमसे कंट्रोल ही नहीं होता , और फ़िर हम भेदभाव नहीं करते , 6 महीने की बच्ची , 60 साल की बूढी , स्वस्थ , सुंदर या अंधी - गुंगी , अमीरी से ढकी या गरीबी से नंगी , नोचते वक्त हम रंग नहीं देखते , और देखना क्या है ,  ज़ाहिर है , प्यार अंधा होता है , और उसी का धंधा होता है , बस सप्लाय कम है , ड़िमांड़ ज्यादा , वैश्वियकरण की नज़र से देखिये समस्या आसान है , ...

मेरी माँ . . . .तेरी माँ की!

हम वो तहज़ीब है जो सीता का राम करते हैं, तेरी माँ की. . . . .बड़े एहसान करते हैं! मेरी बहन की रक्षा की कसम खाई है तेरी बहन की. . . आज़ बारी आयी है! माँ-बहन है, आदर से प्रणाम करते हैं,  ........... किसी और की, चल पतली गली में तेरा काम करते हैं, कहते हैं इश्क़ में हर चीज़ जायज़ है, थोड़ी जबरदस्ती कि तो क्यों शिकायत है? भुख-प्यास माँ से लिपटकर मिटाई है, आदत है बुरी, क्या हुआ जो तु पराई है! बापों से बदसलुकी की आदत आई है, और माँओं ने अपनी खामोशी छुपाई है स्त्री हमारा धन है, पुरुष मन है, जाहिर है, औरत बिकती है और मर्द की मनमानी है! मर्द की छेड़छाड़, उसकी नादानी है, औरत का सड़कों पर होना बेमानी है!

स्त्रीधन

बचपन से हमको सिखाया है,  लड़की हमारी संपत्ति है, और पराया धन, हमारी इज्जत, दुनिया बड़ी बुरी है, मर्दों कि नज़र छुरी है,  चारदिवारी बड़ी है, यही आपकी जिंदगी कि धुरी है, अब ये आपकी किस्मत है अगर आपके भाई-भतिजों या चाचा-ताऊ कि नीयत बुरी है! तसल्ली रखिये, घर की बात घर है, बड़ों की इज्जत-छोटों को प्यार यही है हमारे संस्कार, जो हमें सिखाते हैं, बेटियों का तिरस्कार, पतियों का व्यभिचार माँ लाचार, अनकंड़ीशनल प्यार, कोई बात नहीं बेटा, दिल ही तो है, फ़िर मत करना बलात्कार, हम तुम्हारे लिये ले आयेंगे, अनछुई, छुई-मुई, गोरी-चिट्टी, एक अबला, बॉटल में अचार, खोलो, चखो, खाने में नरम, बिस्तर गरम, घर हमारा मंदिर है दिन में और रात को हरम, परिपक्व है हमारा समाज़, पुरुष-प्रधान है, स्त्री हमारा खर्चा है, (कन्या) दान हैं, जी भर के करते हैं, मर्द कितने महान हैं!