कहाँ पहुँच गए है हम आज हिंसा भी मजबूर है , चारों तरफ कारणों से घिरी हुई खुद ही बीमारी और खुद ही तीमारी और अब जब पूरी आबादी को लग गयी है, तो महामारी और डॉक्टर सारे अपनी सफेदी का शिकार, लाल रंग को सिर्फ बहने देते हैं कहने नहीं, और खुद कि जमीं पर रहने नहीं, कहाँ जाये अब वो जमीं जिस कि हरियाली पेड़ों से छंट कर, जेबों मै बंट रही है पहले जमीन फटती थी, तो सीता समाती थी, अब पूरी कवायत है कमला, मासे, रूपी, जूरी, नर्मदा, वेणु, राजू, मंगता हिंसा से, हिंसा को, हिंसा द्वारा लोकतंत्र सिर्फ एक सवाल बचता है, जिनके पास घर है वो बेघर लोगों को बेदखल क्यों कर रहे हैं ? और जिनके पास कुछ नहीं, वो किस जमीं को जान दे रहे हैं ? (दंतेवाडा के जंगलो मै आदिवासिओं की अपनी जमीं से जुड़े रहने की कोशिशों को समर्पित)
अकेले हर एक अधूरा।पूरा होने के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपने अँधेरे और रोशनी बांटनी पड़ती है।कोई बात अनकही न रह जाये!और जब आप हर पल बदल रहे हैं तो कितनी बातें अनकही रह जायेंगी और आप अधूरे।बस ये मेरी छोटी सी आलसी कोशिश है अपना अधूरापन बांटने की, थोड़ा मैं पूरा होता हूँ थोड़ा आप भी हो जाइये।