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एक अरसे बाद!

फिर एक सफ़र मिले, सरफिरे निकल पड़े, देखें ऊंट किस करवट पड़े! कुछ पुराने, कुछ नए, नाक मुंह परदे लिए, अलग सच या सच से अलग, देखें क्या रास्ते मिले! एयरपोर्ट लाउंज, हवाई सफर, महामारी क्या फ़र्क क्या असर, भीड़ कम है, पर शायद रीढ़ भी! दो के बीच की दूरी, जरूरी...मजबूरी? कुछ ऐसे बंट गए हैं, छुटे हुए और, छट गए हैं! सच्चाई वर्चुअल हो गयी, रोटी कपड़ा मकान, और जरूरी स्मार्ट फोन, जिनके पैर जमीन नहीं, उनको आसमान भी नहीं? बच्चों की पढ़ाई, जैसे कोई जंग, लड़ाई, कैसी ये तरक्की आई, गहरी और हाशिए की खाई! (18 महीने बाद पहली बार एक लंबे सफर को निकलने पर कुछ ख़्याल)

बैठे हैं, बस!

एक आह लिए बैठे हैं एक चाह लिए बैठे हैं, पहचाने रास्ते हैं फिर भी गुमराह हुए बैठे हैं! दर्द तमाम लिए बैठे हैं, क्या इतमिनान लिए बैठे हैं? अपने दिल के बगीचे को वीरान लिए बैठे हैं! एक मुस्कान लिए बैठे हैं, कैसा ये काम लिए बैठे हैं, कहीं कुछ आसान करेंगे, ये गुमान लिए बैठे हैं! अपना आराम लिए बैठे हैं, नक़ाब पहन लिए बैठे हैं, करम के फल हैं सारे,  मूरख मान लिए बैठे हैं! हाथ बांध लिए बैठे हैं, झूठी शान लिए बैठे हैं, कत्ल हो रहे है सच कितने, ओ वो राम लिए बैठे हैं? नया विज्ञान लिए बैठे हैं, चंद्र, मंगलयान लिए बैठे हैं, ऑक्सीजन कम हुई तो क्या? सब बंद कान लिए बैठे हैं!! नफ़रत ठान लिए बैठे हैं, कैसा धर्मज्ञान लिए बैठे हैं मंत्री संत्री सब एक सुर में, तोतों सा ज्ञान लिए बैठे हैं! मुंह में राम लिए बैठे हैं, बगल संविधान लिए बैठे हैं, घड़ियाली आँसू हैं सारे, ओ सब सच मान लिए बैठे हैं?

अंधे आसमाँ 3

मेरी प्यारी बर्बादी अपने लिए अपनी ही हवस , ख़ुद को बनाएगी या मटियाएगी? एक हक़ीकत मेरी , मेरी कितनी सच्चाइयों को निगल जाएगी? मैं कम हूँ या ज्यादा कम? रिजल्ट हूँ अपना , या दुनिया का थन , किसी के हाथों निचुड़ता , पिघलता , रहने को आजाद , और बहने से बर्बाद? क्यों ने अपनी बर्बादी अपने हाथों ले लूं?

जय जय श्री शंकर !

यमुना का किनारा, मजबूर बेचारा जहाँ न पहुँचे कवि, इतनी बदबूदार छवि, वहाँ पहुँचे शंकर, काँटा लगे न कंकर, इसलिये जेसीबी चलवा दिये धरा को धमका के समतल बना दिये प्याला धरम का पिया, थोड़ा सरकार को दिया, थोड़ा जज ने भी चखा,    अल्लाह के नाम पे दे दे बाबा जो दे उसका भला, वरना किसान जैसे फ़ंदे को गला, मैं गिर जाउंगा, उठ न पाउंगा जो तूने मुझे थाम न लिया, ओ सौ सेना का गरेबाँ पकड़ा और उन्हीं की पीठ पे चल दिया, एक के दो दो के चार मुझको क्यों लगते हैं, ऐसा ही होता है जब दो श्री मिलते हैं, उपर राम नीचे संघी घमासान, हो सौ रबड़ी, जलेबी घी की,   ओ संघी भैया, आओ आओ, ओ मेरी उमा, बड़े जतना से गयी भैंस पानी में रे कंधे पे, सर रख के, तुम मुझको खोने दो, अपनी है, सरकारें, जो चाहे होने दो, मीड़िया वालों को मुस्करा के कह दो तुम कितने नादान, कितने कच्चे, तुम्हारे कान, हो सौ खबरी,   दो दिन पहले, एनजीटी का, माल-या खुदा, कहाँ से लायेंगे, छोड़ो जी, ये सब तो, सरकार से ही दिलवाएंगे कुछ भी हो लेकिन मज़ा आ गया नरिंदर अरविंदर सब अपने जाल, राम के नाम शंकर का कमाल! अब देखिये जिंदगी की कला का ...

राम, धरम और एक आसा!

आसा अब राम जपे या अपने कान पकड़े, पैर छूने गये तो बाबा ने गरेबान पकड़े! धर्म का नाम बलि है, गवाहों को स्वर्ग मिली है!  आसा के तो राम हो गए, बाकी सब 'हे राम!हो गए ॐ जय जगदीश हरे, आसा से सब राम मरे! आसा ने कितनों को राम का प्यारा किया, मर गए सब जिनने आसा से किनारा किया  रामप्यारे, वारे न्यारे, भक्त बधारे, मूरख सारे सब झूठी आसा के मारे! राम के बंदे हैं या राम के धंधे मस्ज़िद की कब्र पर मंदिर बनाएंगे, इससे ज्यादा घटिया लोग कहाँ पाएंगे  मज़हब इंसाँ हमको करता है थोडा कम, धर्म धंधा है कामयाब गरीब गले का फंदा! इस मुल्क में अब राम की शरण है, या आपातकालीन मरण है!

जश्न-ए-गुलामी!

चलो गुलामी के जशन बनाएँ वही ठीक है जो होता आया है, स्थिरता कितनी अच्छी चीज़ है, सब कुछ वही....! सही! ज़माना खराब है, नयी चीज़ क्या भरोसा? आज़ादी? बाप रे बाप! आज़ाद खयालात? यानी, सारी मुसीबतों की जड़! छूट जायेगी, बनायी है जो पकड़, बचपन से अब तक, कितनी मेहनत से, भावनओं में जकड़ आश्रित बनाया है, पालन-पोषण का यही सरमाया है, जी जान से किया है अपने पैरों पर खड़ा, उम्र लग गयी, भरने में खाली था घड़ा! कहते हैं, सोच को खुलने दो ख़बरदार, वर्षों की मेहनत मिट्टी में घुलने दो? आखिर कुछ सोच-समझकर ही सब कुछ “तय” है! दुनिया चल रही है, क्योंकि दिलों में भय है! आज़ाद हुए खयालात, तो डर भूल जायेंगे कड़वे सच, व्यवस्था के ठेकेदार कहाँ पचा पायेंगे, बात बढ़ जायेगी, जंग छिड़ जायेगी, और हम अमन पसंद हैं नाक-बंद कर लेंगे, अगर सामने गंद है, दुनिया जैसी है, वैसी ही रहने दो, कुछ आजाद खयालात, गुमशुदा होने दो, अच्छा है! जो “त्याग” करना, संस्कृति की शान है, दो पल शांत , सर झुकाएं चलो! गुलामी का जश्न मनायें!