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छियानवे बाईसी

बात तारीख की नहीं तारीख़ी की है, गौर कीजिए ज़रा बारीख़ी की है। साल छियानवे, महीना जून, मुकाम अहमदाबाद, अकेले थे 'हम' चन्द मुसाफिरों के साथ, थी पहली मुलाकात, हम तब भी रिश्तों के ज़ाहिल थे, और वो तब भी रिश्तों के क़ाबिल! फिर भी कुछ सुर मिल गए, कुछ ताल जम गई, और कुछ बाल रंग गए! वो दुनिया के अकेले थे, हम दुनिया के अजूबे, अलग रास्तों पर चलने के शौकीन, मुसाफिरी तो उसी वक्त शरू हुई, फिर धीरे धीरे रास्ते एक हुए, और हमसफ़र नेक हुए! बाइसों बाते हैं, चौबीस घँटे का साथ है घर की बात नहीं, काम की बात है, काम भी साथ है, अब हम ही मुश्किल हैं, एक दूजे को, ओ हम ही आसान भी, उलझन भी हम ही हैं, सुकूँ भी! सफ़र ज़ारी है, मंज़िलों के हम दोनों ही गुनहगार हैं, रास्तों के तलबगार! और अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें! अपनी राय और हमारी चाय में फर्क करें!

सत्य(।) वचन !

साथ आते हैं , हम , हमारे रास्ते भी मिलते हैं , साथ चलना है , उम्मीदों को भी , आकांक्षाएं भी हैं , और संगी - साथी होने की आशायें भी , नयी पहचान होगी इस साथ से , रास्ते तय होंगे आपस की बात से , फ़िर भी मैं , मैं और तुम तुम होगे , कहीं कहीं दीवारें होंगी रस्ते बनायेंगे , साथ चलेंगे , एक - दूसरे के रस्ते नहीं आयेंगे , मैं अपनी खामिंयों से पुरा हूँ , तुम अपनी कमियों से परिपक्व , अपने साथ आने के ये उसूल है , शुक्रिया नेक इरादों की दुआ रिश्ता कुबूल है !

एक बात की सौ बात!

खुद से दूर जाने की कोशिश तमाम की मैंने जाने अपनी कितनी नींदे हराम की, किसको नज़र आये चेहरे के रेगिस्थान क्यूँ अपनी सारी मुस्कराहट शमशान की? हमसफ़र, साथ देने के शौक तन्हा कर गए हाथ आये फ़ासले जब भी, राय कोई आम की शराफत के सब सौदाई, इतनी इज्ज़त-अफज़ाई कहाँ खरीददार कोई, जो दुकान-ए-ईमान की बंजर जमीन ने कितने इरादे चट्टान किये यूँ माथे की सारी परेशानी पीक-ए-पान की चलते रहे, यूँ अपने ही तूफानों के छोर थाम हमने कहाँ कभी अपनी, मुश्किल आसान की 

एक दो तीन. . . चौदह,पन्दरह

--> बचपन के तेरह , अल्हड़पन के पांच जवानी के छह – आठ और दीवानगी के पन्द्रह कभी सोचा था  ? दीवानगी सबसे काबिल साबित होगी  ! हाथ होगी  , साथ रहेगी  , मुश्किलो  की बात रहेगी , और मुश्किलो को मात रहेगी एक उम्र पीछे छोड दी  , बचपन , अल्हड़्पन और जवानी  , नहीं कह सकते  , हार मान गये  , पर ये जरुर भान गये  , जान गये  , दाल कभी कभी गल सकती है  , जल सकती है , पर पल नहीं सकती या फिर युँ कहिये , कि सब ने अपनी जगह ढ़ुंढ ली  , बचपन आता है  , टोह लेने  , खेल जाता है , तु - तु , मैं - मैं , अड़ जाता है कभी जिद्द् पे  , जाओ कट्टी ! निराश होने कि बात नहीं  , जवानी भी तो ताक लगाये बैठी है  ,  मन ही मन कहती है  , “ मिठ्ठी - मिठ्ठी " अल्हड़्पन भी कुछ कम नहीं सताता  , अपनी धुन में आ जाये तो उसे कुछ नहीं भाता  , मुँह फ़ुला , और कुछ नहीं बताता  , चॆहरे के सामने पीठ होती है  , ये उमर ही ऐसी ढ़ीट होती है  , और चंच...